जम्मू-कश्मीर की राजनीति में गरमाया तापमान
जम्मू-कश्मीर में विधानसभा के आगामी सत्र के शुरू होने से पहले ही सियासी गलियारों में सरगर्मी काफी बढ़ गई है। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लिया है। बीजेपी का साफ कहना है कि सरकार जनता से किए गए अपने चुनावी वादों को पूरा करने में नाकाम साबित हो रही है और अब विधानसभा के पटल पर सरकार से हर एक वादे का हिसाब मांगा जाएगा।
राज्य की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या रोजमर्रा की प्रशासनिक और बुनियादी समस्याओं के लिए राज्य के दर्जे की बहाली का इंतजार किया जाना चाहिए। बीजेपी ने इसी मुद्दे को आधार बनाते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) सरकार को घेरने की ठोस रणनीति तैयार कर ली है। आगामी सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिल सकती है, क्योंकि दोनों तरफ से तेवर पूरी तरह से कड़े नजर आ रहे हैं।
संबंधित खबरें
बुनियादी सुविधाओं पर सियासत और बीजेपी का सवाल
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने श्रीनगर में आयोजित एक जनसंवाद कार्यक्रम के दौरान सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोला। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पानी की आपूर्ति, बिजली के तार और पोल लगाने, स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति, अस्पतालों में डॉक्टरों की व्यवस्था और सड़कों के गड्ढे भरने जैसे छोटे और बुनियादी कामों के लिए भी सरकार अधिकारों की कमी का बहाना बनाती है, तो फिर ऐसी सरकार के अस्तित्व का क्या मतलब है?
शर्मा ने कहा कि जनता अपनी रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान की उम्मीद के साथ चुनी हुई सरकार के पास पहुंचती है, लेकिन उसे हर बार यही सुनने को मिलता है कि पर्याप्त अधिकार न होने के कारण काम रुका हुआ है। बीजेपी का यह भी आरोप है कि सरकार 'स्टेटहुड' (राज्य का दर्जा) के संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे का इस्तेमाल केवल अपनी प्रशासनिक विफलताओं और नाकामी को छिपाने के एक ढाल के रूप में कर रही है।
"यदि पानी, बिजली, सड़क, स्कूल और अस्पतालों जैसे बुनियादी कामों के लिए भी सरकार अधिकारों की कमी का हवाला देती है, तो फिर सरकार में बैठने का औचित्य ही क्या है? जनता ने विकास के लिए वोट दिया था, बहाने सुनने के लिए नहीं।" — सुनील शर्मा, नेता प्रतिपक्ष, जम्मू-कश्मीर विधानसभा
चुनावी वादों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर जिरह
चुनी हुई सरकार को सत्ता संभाले हुए लगभग दो साल का समय बीत चुका है। ऐसे में बीजेपी का तर्क है कि अब जनता के सामने शासन की वास्तविक कार्यप्रणाली और समस्याओं के समाधान की एक स्पष्ट तस्वीर आ जानी चाहिए। विपक्ष का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान जनता से तमाम बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन जमीन पर उनका असर बिल्कुल भी दिखाई नहीं दे रहा है।
आगामी विधानसभा सत्र के दौरान बीजेपी इन सभी मुद्दों को बेहद आक्रामक तरीके से उठाएगी। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सदन के भीतर स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और दैनिक वेतनभोगियों से जुड़े तमाम लंबित मामलों पर सरकार को कटघरे में खड़ा करेगी। विपक्ष का यह भी मानना है कि जनता के बुनियादी अधिकारों से जुड़े इन विषयों पर किसी भी तरह की लीपापोती को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
रोजगार और आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर उठे गंभीर सवाल
बेरोजगारी और युवाओं के भविष्य का मुद्दा हमेशा से कश्मीर घाटी की राजनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। सुनील शर्मा ने इस मोर्चे पर भी सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने 19 से 29 वर्ष के आयु वर्ग के युवाओं के सामने आ रही गंभीर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का जिक्र करते हुए सरकार से रोजगार के अवसरों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है।
इसके साथ ही, सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के जरिए लगभग 25 हजार पदों को भरे जाने के दावों पर भी तीखे सवाल उठाए गए हैं। बीजेपी ने सरकार से पूछा है कि क्या इन पदों को पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट आधारित लोक सेवा भर्ती प्रक्रिया के तहत भरा जा रहा है या इसमें किसी प्रकार की धांधली हो रही है। युवा वर्ग में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि सरकारी नौकरियों के नाम पर उन्हें सिर्फ आश्वासन मिल रहे हैं।
सत्ता और विपक्ष की दोहरी भूमिका पर तंज
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उमर अब्दुल्ला सरकार इस समय एक दोहरी चुनौती का सामना कर रही है। एक तरफ उसे केंद्र सरकार के साथ अपने प्रशासनिक तालमेल को बिठाना है, तो दूसरी तरफ जनता और विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी ने सरकार पर यह गंभीर आरोप भी लगाया है कि वह कभी खुद को पूरी तरह मजबूत चुनी हुई सरकार बताती है, तो कभी अधिकारों के अभाव का रोना रोकर विपक्ष की तरह व्यवहार करने लगती है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आगामी विधानसभा सत्र केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहने वाला है। एक तरफ जहां सत्ता पक्ष अपनी राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को प्रमुखता से उठाएगा, वहीं बीजेपी ने विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों को धार देकर सरकार की जवाबदेही तय करने का मन बना लिया है। आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर की सियासत में इन मुद्दों परवान चढ़ना तय माना जा रहा है।
निष्कर्ष: जनता की उम्मीदें और आगामी सत्र की रूपरेखा
कुल मिलाकर देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इस समय 'स्टेटहुड बनाम डेली गवर्नेंस' (राज्य का दर्जा बनाम रोजमर्रा का शासन) की बड़ी जंग छिड़ चुकी है। सरकार के लिए जहां अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को जनता के बीच सही साबित करना एक बड़ी चुनौती है, वहीं विपक्ष के लिए आम जनता के मुद्दों को उठाकर राजनीतिक जमीन मजबूत करने का यह सबसे बड़ा मौका है।
आगामी विधानसभा सत्र इस बात का फैसला करेगा कि सदन के भीतर जनता की आवाज कितनी मजबूती से गूंजती है। राज्य की आम जनता इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच केवल यही चाहती है कि उनके इलाके में बिजली, पानी, सड़क और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं बिना किसी राजनीतिक ड्रामे के समय पर मिल सकें।





