बिहार की राजनीति में उठा नया भूचाल, अपनी ही सरकार पर बरसे बीजेपी विधायक
बिहार की सियासत में एक बार फिर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से ही बड़े सवाल उठने लगे हैं। पूर्वी चंपारण की लौरिया विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक और पूर्व मंत्री विनय बिहारी ने अपनी ही पार्टी की सरकार के कामकाज के तरीके पर खुलकर निशाना साधा है। उनके इस बयान के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विनय बिहारी अपनी बेबाक शैली और भोजपुरी गीतों के लिए जाने जाते हैं, और इस बार भी उन्होंने अपने अंदाज में सरकार की नीतियों की पोल खोली है।
बक्सर पहुंचे बीजेपी विधायक ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी और कहा कि उन्हें इस बात का पूरा अंदेशा है कि इस बयान के बाद उनके खिलाफ पार्टी स्तर पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि गलत को गलत कहना और सच का साथ देना उनके संस्कारों में शामिल है, जो उन्हें पार्टी से ही मिले हैं। उनके इस बयान ने विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का एक नया मौका दे दिया है।
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कर्ज के सहारे विकास पर उठाया सवाल, भोजपुरी में कसा तंज
विनय बिहारी ने राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज बिहार में विकास कार्यों के लिए जो रूपरेखा तैयार की जा रही है, वह पूरी तरह से कर्ज पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावों के दौरान किस तरह से धन का इस्तेमाल किया जाता है, यह किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब चुनाव के समय दस-दस हजार रुपये बांटे जाएंगे, तो जाहिर है कि सरकारी खजाने और विकास कार्यों पर इसका बुरा असर पड़ेगा।
अपने बयानों के लिए मशहूर विधायक ने भोजपुरी पंक्तियों के जरिए अपनी बात को जनता तक पहुंचाया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आखिर सरकार कब तक उधार और कर्ज के सहारे गाड़ी चलाएगी। उनके इस बयान ने प्रशासनिक हलकों में भी चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है कि क्या वाकई राज्य के पास बुनियादी विकास के लिए पर्याप्त फंड की कमी हो गई है।
"केतना कर्जा खइबअ ऐ राजा, केतना कर्जा खइबअ... कर्जा खा के विकास कइसे करबइबअ ऐ राजा, केतना कर्जा खइबअ। यह अच्छी बात नहीं है। जब चुनाव के समय पैसे बांटे जाते हैं, तो विकास के काम बाधित होते ही हैं।" — विनय बिहारी, बीजेपी विधायक एवं पूर्व मंत्री
भगवान श्रीराम की नगरी बक्सर की उपेक्षा का भी उठाया मुद्दा
सिर्फ वित्तीय प्रबंधन पर ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों की स्थिति को लेकर भी विधायक ने नाराजगी जताई। बक्सर दौरे के दौरान विनय बिहारी ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की भूमि होने के बावजूद बक्सर का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि ऐसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों पर विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है, लेकिन धरातल पर स्थिति उतनी बेहतर नहीं दिखती जितनी होनी चाहिए थी।
उन्होंने कहा कि जब वे क्षेत्र में जाते हैं और लोगों की समस्याएं देखते हैं, तो उन्हें दुख होता है। एक जनप्रतिनिधि होने के नाते जनता के बीच सच बोलना उनका धर्म है, भले ही इसके परिणाम उनके राजनीतिक भविष्य या पद के लिहाज से प्रतिकूल क्यों न हों। उनका यह बयान धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के विकास के दावों की पोल खोलता नजर आ रहा है.
नतीजों की परवाह किए बिना सच बोलने की बात
अपने बयान के परिणामों के बारे में बात करते हुए विनय बिहारी ने बहुत ही बेबाकी से अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि मीडिया के सामने खुलकर बोलने के क्या नतीजे हो सकते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं। उन्होंने एक कहावत का जिक्र करते हुए कहा कि राजनीति में अक्सर कम बोलने से वोट करते हैं, ज्यादा बोलने से टिकट कटता है और बहुत ज्यादा बोलने से गर्दन कट जाती है। इसके बावजूद उन्होंने अपनी बात को बिना किसी डर के सबके सामने रखा।
उन्होंने यह भी दोहराया कि भारतीय जनता पार्टी उनके लिए एक मंदिर की तरह है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पार्टी के भीतर या सरकार में कुछ गलत हो रहा हो तो उस पर आंखें मूंद ली जाएं। पार्टी ने ही उन्हें सच के लिए खड़े होने का हुनर और संस्कार सिखाया है, और वे उसी मार्ग पर चल रहे हैं।
विवादों और बयानों से पुराना नाता रहा है
यह पहली बार नहीं है जब विनय बिहारी ने अपनी ही सरकार के सामने असहज स्थिति पैदा की हो। इससे पहले भी वे कई मौकों पर सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठा चुके हैं। पूर्ण शराबबंदी कानून को लेकर उनका एक पुराना बयान काफी चर्चा में रहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रतिबंध के बावजूद आसानी से शराब मिल जाती है और लोग उसका सेवन करते हैं। इसके अलावा विधानसभा के पटल पर अपने क्षेत्र की एक सड़क के निर्माण को लेकर भी उन्होंने अपनी ही सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयानों से भले ही पार्टी के भीतर थोड़ी असहजता पैदा होती हो, लेकिन यह लोकतंत्र के स्वस्थ संकेत के रूप में भी देखा जाता है जहां एक जनप्रतिनिधि जनता की आवाज को बिना किसी दबाव के उठा रहा है। अब देखना यह होगा कि पार्टी हाईकमान इस बयान पर क्या रुख अपनाता है और आने वाले दिनों में इसका क्या असर देखने को मिलता है।




