बेंगलुरु में ध्रुव राठी ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर उठाए बड़े सवाल
लोकप्रिय सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और यूट्यूबर ध्रुव राठी ने हाल ही में बेंगलुरु में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदान सूचियों में पारदर्शिता को लेकर तीखे हमले किए हैं। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में वोटर लिस्ट से नाम जोड़े जाने और हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए। राठी का यह बयान देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ध्रुव राठी ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता का होना बेहद जरूरी है, लेकिन हालिया आंकड़े कई तरह की शंकाओं को जन्म देते हैं। उन्होंने देश के कुछ प्रमुख राज्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया और वहां की मतदाता सूचियों में हुए बदलावों पर संदेह व्यक्त किया। उनके इन बयानों के बाद राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है और विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
पश्चिम बंगाल और बिहार में वोटर लिस्ट संशोधन पर खड़े किए गए सवाल
अपने संबोधन के दौरान ध्रुव राठी ने पश्चिम बंगाल और बिहार का विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए थे, लेकिन चुनाव परिणाम सामने आने के बाद उन्हीं नामों को वापस जोड़ दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ये नाम अवैध थे या सूची में मृत मतदाताओं के थे, तो इन्हें दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी की गई।
बिहार का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में करीब 65 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, लेकिन इस संबंध में चुनाव आयोग की तरफ से कोई स्पष्ट या पारदर्शी जानकारी साझा नहीं की गई। राठी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम क्यों हटाए गए और इसके पीछे क्या प्रशासनिक कारण रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और डेटा सार्वजनिक करने की मांग
ध्रुव राठी ने अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने कई मामलों में तब तक जानकारी साझा नहीं की, जब तक कि देश की सर्वोच्च अदालत का स्पष्ट आदेश नहीं आ गया। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं को खुद से आगे आकर पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए ताकि नागरिकों का लोकतंत्र पर भरोसा और मजबूत हो सके।
उन्होंने उत्तर प्रदेश और गोवा का भी उदाहरण दिया। उत्तर प्रदेश में अचानक लाखों वोटर्स के नाम जोड़े जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने इसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाया। वहीं गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि स्थानीय स्तर पर अधिकारियों द्वारा नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर कई तरह की बाधाएं और मनमानी सामने आ रही हैं, जिस पर रोक लगनी चाहिए।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में बढ़ी हलचल
ध्रुव राठी द्वारा उठाए गए इन सवालों के बाद देश भर में चुनावी प्रक्रिया और निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हालांकि, चुनाव आयोग या सरकार की तरफ से इन बụयानों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विपक्षी दल इन मुद्दों को लगातार तूल दे रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल युग में मतदाता सूचियों की पारदर्शिता और डिजिटल डेटा की सुरक्षा आने वाले समय में एक बड़ा मुद्दा बन सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि हर नागरिक के वोट के अधिकार की रक्षा हो और चुनाव से जुड़ी हर प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो। ध्रुव राठी के इन दावों ने एक बार फिर से चुनावी तंत्र की कार्यशैली पर जनता का ध्यान केंद्रित कर दिया है, जिससे आने वाले दिनों में राजनीतिक पारा और चढ़ने की संभावना है।









