राजघाट पर विपक्ष का हल्ला बोल और पुलिस के कड़े पहरे
देश की राजधानी दिल्ली में राजनीतिक सरगर्मी एक बार फिर अपने चरम पर पहुंच गई है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के कथित रवैये के विरोध में विपक्षी दलों का आंदोलन लगातार तीसरे दिन भी जारी रहा। इस बार विरोध की आंच राजघाट तक पहुंच गई, जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि के पास कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में भारी संख्या में नेता और कार्यकर्ता इकट्ठा हुए।
सुबह से ही राजघाट और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों का भारी जमावड़ा देखा गया। पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों ने बैरिकेडिंग कर इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया था। इसके बावजूद विपक्षी दलों के नेता अपनी मांगों पर अड़े रहे और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। नेताओं का साफ कहना था कि देश में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता खतरे में है और इसके खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
दिल्ली में प्रदर्शन की इजाजत न मिलने पर भड़के विपक्षी नेता
विरोध प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि प्रशासन द्वारा उन्हें दिल्ली के अन्य प्रमुख स्थलों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। हर नुक्कड़ और चौराहे पर पुलिस तैनात कर दी जाती है ताकि विपक्ष की आवाज को दबाया जा सके।
राजघाट पर जुटे नेताओं ने कहा कि जब जनता के बुनियादी मुद्दों और लोकतांत्रिक अधिकारों पर कुठाराघात होता है, तब सड़कों पर उतरना ही एकमात्र विकल्प बचता है। विपक्षी दलों का यह भी कहना था कि चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्थाओं को दबाव में काम करने से रोकने के लिए यह लड़ाई लंबी चलेगी। सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच कई बार हल्की झड़प की स्थिति भी बनी, लेकिन नेताओं ने संयम बनाए रखा।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की कार्यशैली और निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल हैं। विपक्षी गठबंधन का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्ताधारी पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है और चुनावों में पारदर्शिता से समझौता किया जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से लगातार ज्ञापन देने और मिलने का समय मांगने के बावजूद कोई ठोस सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने के कारण विपक्ष ने सड़क पर उतरने का कड़ा फैसला किया।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है क्योंकि विपक्ष इसे एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बहाल नहीं होती, उनका यह संघर्ष विभिन्न स्वरूपों में जारी रहेगा।
महात्मा गांधी की समाधि पर संकल्प और आगे की रणनीति
राजघाट पहुंचे नेताओं ने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद कुछ देर मौन रखकर देश में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लिया। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रीय दलों के सांसद और पदाधिकारी भी मौजूद रहे, जिन्होंने एकजुटता का संदेश दिया। विपक्षी दलों की यह साझा रणनीति आने वाले संसद सत्र और चुनावी राज्यों में भी असर दिखा सकती है।
"देश के लोकतंत्र को बचाने और स्वतंत्र संस्थाओं को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए हमारी यह लड़ाई रुकने वाली नहीं है। सरकार चाहे जितनी पाबंदियां लगा ले, जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।" — राहुल गांधी, सांसद
कुल मिलाकर, राजघाट पर हुए इस प्रदर्शन ने एक बार फिर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच की तनातनी को सतह पर ला दिया है। प्रशासनिक पाबंदियों और सुरक्षा के कड़े पहरे के बीच विपक्षी दलों का यह तेवर साफ संकेत देता है कि राजनीतिक माहौल आने वाले दिनों में और अधिक गरमाने वाला है।










