कड़ी सुरक्षा और उत्साह के बीच हुई थी डीयूएसयू चुनाव की वोटिंग
दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव 2026 के लिए वोटों की गिनती का काम पूरी सख्ती और सुरक्षा के बीच जारी है। इससे पहले शुक्रवार को यूनिवर्सिटी परिसर में भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच छात्रों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस साल चुनाव में कुल 40.46 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो पिछले साल के मुकाबले थोड़ा अधिक है। चुनाव को लेकर छात्रों में गजब का उत्साह देखने को मिला था, क्योंकि जंतर-मंतर पर युवाओं के प्रदर्शन के बाद से ही छात्र राजनीति में जवाबदेही और अधिकारों का मुद्दा सबसे ऊपर रहा था।
सुबह से ही दिल्ली विश्वविद्यालय के काउंटिंग सेंटर पर छात्र नेताओं और समर्थकों की भीड़ जुटी हुई है। हर राउंड के बाद बदल रहे समीकरणों ने दोनों प्रमुख छात्र संगठनों की धड़कनों को बढ़ा दिया है। शुरुआती रुझानों में कभी एबीवीपी आगे निकलती है तो कभी एनएसयूआई बढ़त बना लेती है, जिससे मुकाबला बेहद रोमांचक हो गया है।
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अध्यक्ष पद पर यश डबास और विजय शंकर मीणा में रोमांचक मुकाबला
छात्रसंघ चुनाव के सबसे अहम यानी अध्यक्ष पद के लिए मुकाबला बेहद कड़ा चल रहा है। शुरुआती दौर में एबीवीपी के यश डबास आगे चल रहे थे, लेकिन बीच के राउंड में एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा ने बढ़त हासिल कर ली थी। हालांकि, जैसे-जैसे गिनती आगे बढ़ी, यश डबास ने एक बार फिर शानदार वापसी करते हुए बढ़त बना ली है। छठे राउंड के परिणामों के अनुसार, यश डबास अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे चल रहे हैं, लेकिन जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं है।
दोनों ही संगठनों के समर्थक काउंटिंग सेंटर के बाहर लगातार नारेबाजी कर रहे हैं और अपने-अपने उम्मीदवार की जीत का दावा कर रहे हैं। इस बार के चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए कुल सात उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन मुख्य मुकाबला एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच ही सिमट कर रह गया है।
उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों का जलवा
मुख्य राजनीतिक दलों के संगठनों के अलावा इस बार के डीयूएसयू चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चौंकाने वाले प्रदर्शन किए हैं। छठे राउंड के वोटों की गिनती के बाद उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने मजबूत बढ़त बना ली है। उनके पीछे एबीवीपी के इशू मौर्य और एनएसयूआई के वीर चतरथ चल रहे हैं।
इसी तरह संयुक्त सचिव पद के लिए भी निर्दलीय उम्मीदवार विशेष यादव रेस में सबसे आगे बने हुए हैं। उनके बाद एबीवीपी और एनएसयूआई के उम्मीदवार कड़ी टक्कर दे रहे हैं। जानकारों का मानना है कि इस बार के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने पारंपरिक दलों के समीकरणों को काफी हद तक प्रभावित किया है, जिससे अंतिम परिणाम किसी के भी पक्ष में जा सकते हैं।
सचिव पद पर एबीवीपी की रिया छाबड़ी ने बनाई बढ़त
सचिव पद की बात करें तो यहाँ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की उम्मीदवार रिया छाबड़ी शुरुआती दौर से ही मजबूत स्थिति में नजर आ रही हैं। छठे राउंड के परिणामों के मुताबिक, रिया छाबड़ी अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी एनएसयूआई की नम्रता चौधरी से आगे चल रही हैं।
एबीवीपी ने अपनी इस बढ़त पर खुशी जाहिर करते हुए कहा है कि छात्रों ने उनके द्वारा किए गए कामों और वादों पर भरोसा जताया है। संगठन का दावा है कि अन्य कॉलेजों के आंतरिक चुनावों की तरह डीयूएसयू के मुख्य पैनल में भी उन्हें भारी सफलता मिलने जा रही है।
कॉलेज स्तर के चुनावों में एबीवीपी का शानदार प्रदर्शन
डीयूएसयू के केंद्रीय पैनल के परिणामों से पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों में हुए छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी ने अपना परचम लहराया है। श्रीराम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (SRCC) समेत कई प्रमुख कॉलेजों में एबीवीपी ने क्लीन स्वीप किया है। संगठन ने अदिति महाविद्यालय, श्री अरबिंदो कॉलेज, शिवाजी कॉलेज और भारती कॉलेज जैसे संस्थानों में भी शानदार जीत दर्ज की है।
आरएसएस से जुड़े इस छात्र संगठन का दावा है कि इस बार के चुनाव परिणाम उनके पक्ष में '4-0' के ऐतिहासिक अंतर से आएंगे। संगठन के नेताओं का कहना है कि छात्रों ने कैंपस में सकारात्मक राजनीति और विकास के मुद्दों को चुना है।
"छात्रों ने हमारी विचारधारा और उनके कल्याण के लिए किए गए कार्यों पर मुहर लगाई है। हमें पूरा विश्वास है कि इस बार डीयूएसयू के चारों पदों पर एबीवीपी ऐतिहासिक जीत दर्ज करेगी।" — एबीवीपी नेतृत्व
राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर
दिल्ली यूनिवर्सिटी के ये छात्र चुनाव केवल शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इन्हें देश की राष्ट्रीय राजनीति का सेमीफाइनल भी माना जाता है। कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई और भाजपा समर्थित एबीवीपी के बीच की इस जंग में आम आदमी पार्टी के छात्र संगठन ने भी अपनी जमीन तलाशने की कोशिश की है। हालांकि, मुख्य मुकाबला पारंपरिक रूप से दो ध्रुवीय ही नजर आ रहा है।
जैसे-जैसे गिनती के आखिरी दौर नजदीक आ रहे हैं, दोनों तरफ के नेताओं की धड़कनें तेज हो गई हैं। देखना यह होगा कि अंतिम परिणाम किसके पक्ष में जाते हैं और कौन सा संगठन अगले एक साल तक दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति की कमान संभालता है।






