पंजाब की राजनीति में आने वाले दिनों में एक बड़ा भूचाल देखने को मिल सकता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने साफ कर दिया है कि राज्य में अब उसका सियासी कद और भूमिका पुरानी नहीं रहेगी। केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता हरदीप सिंह पुरी ने अमृतसर में एक बड़ा बयान देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि भविष्य में शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ दोबारा गठबंधन होता है, तो पार्टी पुराने ढर्रे पर काम नहीं करेगी। भाजपा अब पंजाब में किसी भी सूरत में 'छोटे भाई' या जूनियर पार्टनर की भूमिका में चुनाव मैदान में नहीं उतरेगी। उनके इस बयान ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है और कयासों का दौर शुरू हो गया है।
अमृतसर में हरदीप पुरी का बड़ा सियासी ऐलान
अमृतसर पहुंचे केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मीडिया से खुलकर बात की और पंजाब की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि समय बदल चुका है और पंजाब में भाजपा का जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है। ऐसे में पुरानी व्यवस्थाओं को वैसे का वैसा दोहराना संभव नहीं होगा।
उन्होंने विशेष रूप से उस फॉर्मूले का जिक्र किया जिसके तहत अतीत में भाजपा और अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ते थे। पुरी ने दो टूक शब्दों में कहा कि अब वह पुराना दौर जा चुका है जब भाजपा केवल 22 या 23 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा करती थी और बाकी की सीटों पर अकाली दल अपने उम्मीदवार उतारता था। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की मेहनत से राज्य में भाजपा का संगठन अब काफी व्यापक हो चुका है।
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क्या है 50-50 फॉर्मूले की चर्चा के मायने?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरदीप सिंह पुरी का यह बयान महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा है। पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों पर सियासी पकड़ मजबूत करने के लिए भाजपा अब अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहती है।
यदि अकाली दल के साथ दोबारा पैचअप की बात आगे बढ़ती है, तो सीटों का बंटवारा एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। भाजपा यह साफ संदेश देना चाहती है कि वह पंजाब में अब किसी के पिछलग्गू बनकर नहीं, बल्कि एक मजबूत और स्वतंत्र ताकत के रूप में खड़ी होना चाहती है। पार्टी का मानना है कि राज्य के शहरी और ग्रामीण इलाकों में अब पार्टी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
एनडीए से अलगाव और वापसी की अटकलें
गौरतलब है कि अकाली दल ने साल 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में एनडीए का साथ छोड़ दिया था। इस फैसले ने दशकों पुराने उस राजनीतिक गठबंधन को तोड़ दिया था जो पंजाब में सरकार चलाने का मुख्य आधार हुआ करता था। हालांकि, पिछले कुछ महीनों से दोनों दलों के बीच फिर से नजदीकियां बढ़ने की चर्चाएं तेज थीं।
खास तौर पर इसी साल अगस्त के महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल के बीच हुई एक गुप्त और अहम मुलाकात के बाद इन अटकलों को और हवा मिली थी कि दोनों पुराने सहयोगी एक बार फिर साथ आ सकते हैं। लेकिन हरदीप पुरी के इस ताजा बयान ने यह साफ कर दिया है कि यदि वापसी होगी भी, तो उसकी शर्तें अब पूरी तरह से बदली हुई होंगी।
"पंजाब में भाजपा अब अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ी है। आने वाले समय में अगर कोई गठबंधन होता है, तो वह बराबरी के हक और सम्मानजनक सीटों के आधार पर ही संभव होगा, छोटे भाई की भूमिका अब खत्म हो चुकी है।" — हरदीप सिंह पुरी, केंद्रीय मंत्री
भगवंत मान सरकार पर तीखा हमला
सिर्फ गठबंधन और सीटों की बात ही नहीं, बल्कि हरदीप सिंह पुरी ने पंजाब की मौजूदा आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से चरमरा चुकी है।
उन्होंने कहा कि पंजाब में न केवल आम जनता बल्कि खुद राज्य का पुलिस बल भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। केंद्र सरकार पंजाब को नशे के नासूर से पूरी तरह मुक्त कराने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन राज्य सरकार सहयोग करने के बजाय केवल सियासत कर रही है। युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने के मामले में भी राज्य सरकार पूरी तरह विफल साबित हुई है।
निष्कर्ष और आगे की सियासी तस्वीर
पंजाब की राजनीति में भाजपा का यह आक्रामक तेवर इस बात की ओर इशारा करता है कि पार्टी अब राज्य में अपने दम पर बड़ा सियासी विकल्प बनने की तैयारी में है। अकाली दल के साथ यदि गठबंधन होता भी है, तो भाजपा अपनी शर्तों पर ही समझौता करेगी। आगामी चुनावों के मद्देनजर यह बयान पंजाब की राजनीति की नई दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है, जहां क्षेत्रीय दलों को अब राष्ट्रीय पार्टी के सामने झुकने के बजाय बराबरी की टक्कर देनी होगी।



