देश के पर्यावरण संरक्षण और न्याय प्रणाली से जुड़े मामलों को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक के दौरान केंद्र सरकार ने सोची-समझी रणनीति के तहत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी (NGT) को काफी कमजोर कर दिया है। जयराम रमेश ने एक हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए यह गंभीर दावा किया है कि इस साल के शुरुआती छह महीनों में एनजीटी द्वारा पर्यावरण और जनहित से जुड़े मामलों में एक भी फैसला आम नागरिकों या पर्यावरणविदों के पक्ष में नहीं आया है।
अध्ययन के आंकड़े और एनजीटी की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
कांग्रेस नेता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक रिपोर्ट साझा करते हुए आंकड़े पेश किए। उन्होंने 'साउथ एशियन रिपोर्टर फॉर एनवायरनमेंट लॉज' की 19 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट का जिक्र किया। इस अध्ययन के मुताबिक, साल 2026 के शुरुआती छह महीनों (यानी जनवरी से जून के बीच) में देश भर की एनजीटी बेंचों के सामने कुल 119 अपीलें दायर की गई थीं। इनमें से 52 अपीलें केवल प्रक्रियात्मक (Procedural) आधार पर ही खारिज कर दी गईं, जो अपने आप में एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी और प्रक्रियात्मक कमियों के आधार पर इतनी बड़ी संख्या में मामलों का खारिज होना न्याय चाहने वाले आम लोगों के लिए एक बड़ी बाधा बन रहा है। पर्यावरण न्याय की गुहार लगाने वाले लोग अक्सर कानूनी बारीकियों और तकनीकी अड़चनों के कारण अपनी बात मजबूती से रख नहीं पाते हैं, जिसका सीधा फायदा बड़ी कंपनियों और प्रोजेक्ट प्रमोटरों को मिलता दिखाई दे रहा है।
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इंडस्ट्री और प्रोजेक्ट प्रमोटरों को मिली बड़ी राहत
जयराम रमेश द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, मेरिट के आधार पर जिन 67 अपीलों की सुनवाई हुई, उनमें से 51 अपीलें सीधे तौर पर इंडस्ट्री (उद्योगों), बड़े प्रोजेक्ट प्रमोटरों या प्रॉपर्टी मालिकों द्वारा दायर की गई थीं। इन 51 मामलों में से करीब 30 मामलों में यानी लगभग 60 प्रतिशत मामलों में फैसला इन उद्योगपतियों और प्रमोटरों के हक में सुनाया गया।
इसके विपरीत, जब पर्यावरण प्रेमियों, स्थानीय निवासियों या जनहित से जुड़े पक्षों ने पर्यावरण न्याय की मांग करते हुए अपनी 16 अपीलें अदालत के सामने रखीं, तो स्थिति बिल्कुल अलग थी। रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण और जनहित से जुड़ी सभी 16 अपीलें खारिज कर दी गईं और किसी भी पर्यावरणवादी या प्रभावित नागरिक को अपने पक्ष में राहत भरा फैसला नहीं मिल सका। यह अंतर साफ तौर पर यह दर्शाता है कि पलड़ा किस तरफ भारी झुक रहा है।
पूर्व पर्यावरण मंत्री की दो टूक: मूल मकसद को भूले एनजीटी
पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कड़े शब्दों में कहा कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को अब एक बार फिर एनजीटी एक्ट की असली भावना और उसके मूल उद्देश्यों को समझने की जरूरत है। आपको बता दें कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना 2 जून 2010 को पर्यावरण से जुड़े मामलों के त्वरित और प्रभावी निपटारे के लिए की गई थी ताकि देश के प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों, नदियों और हवा को बचाया जा सके।
"साउथ एशियन रिपोर्टर फॉर एनवायरनमेंट लॉज के अध्ययन से यह साफ है कि पिछले एक दशक में एनजीटी को कमजोर किया गया है। 2026 के पहले छह महीनों में मेरिट के आधार पर सुनी गई अपीलों में पर्यावरण या जनहित पक्ष को एक भी न्यायसंगत फैसला नहीं मिला। एनजीटी को अपने मूल मकसद को फिर से अपनाना होगा।" — जयराम रमेश, कांग्रेस नेता एवं पूर्व पर्यावरण मंत्री
पर्यावरण न्याय और जनता के अधिकारों पर बहस तेज
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद देश भर के पर्यावरणविदों, कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी दलों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि यदि पर्यावरणीय मामलों में जनहित की अनदेखी की जाएगी और विकास परियोजनाओं को अंधाधुंध बढ़ावा दिया जाएगा, तो देश के प्राकृतिक संतुलन को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। दूसरी ओर, सरकार समर्थकों और उद्योग जगत का यह तर्क रहता है कि विकास और बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे होने देश की आर्थिक तरक्की के लिए बहुत जरूरी हैं।
बहरहाल, जयराम रमेश के इन ताजा बयानों और आंकड़ों ने एक बार फिर वैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनके काम करने के तौर-तरीकों पर सार्वजनिक चर्चा छेड़ दी है। आने वाले दिनों में देखना यह होगा कि इस रिपोर्ट और राजनीतिक बयानों पर पर्यावरण मंत्रालय या एनजीटी की तरफ से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है।





