नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शनों का दौर लौटने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। पिछले कुछ हफ्तों से राजधानी के इस प्रमुख सार्वजनिक और राजनीतिक केंद्र पर सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी कर दी गई है। इसी बीच, सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस यानी CJP संगठन ने एक बार फिर जंतर-मंतर पर उतरकर प्रदर्शन करने की पूरी तैयारी कर ली है। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि वे लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत अपनी आवाज बुलंद करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और इसके लिए स्थानीय प्रशासन व पुलिस से लगातार बातचीत की जा रही है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, CJP के प्रतिनिधिमंडल ने तय किया है कि वे दिल्ली पुलिस के बड़े अधिकारियों से मिलकर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए तारीख तय करने का औपचारिक अनुरोध करेंगे। जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ समय में दिल्ली में बड़े पैमाने पर धरने-प्रदर्शनों को रोकने के लिए प्रशासन स्तर पर जो पाबंदियां लगाई गई हैं, उनके बीच यह कदम काफी अहम माना जा रहा है। दिल्ली पुलिस के सामने यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वे कानून व्यवस्था को बनाए रखते हुए नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रदर्शन करने की आजादी के बीच कैसे संतुलन बिठाते हैं।
जंतर-मंतर के पारंपरिक धरनों पर क्यों लगी है पाबंदी?
दिल्ली में पिछले कुछ महीनों से जंतर-मंतर और उसके आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शनों को लेकर नियमों का शिकंजा कसा जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सरकार और स्थानीय प्रशासन ने राष्ट्रीय राजधानी में धरने और विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर कुछ अन्य नए स्थान तय किए हैं ताकि मुख्य शहर में ट्रैफिक जाम और सुरक्षा संबंधी समस्याओं से बचा जा सके। लगभग 33 साल पहले जंतर-मंतर को प्रदर्शनों के लिए आधिकारिक रूप से अनुमति दी गई थी, जहां ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन से लेकर पहलवानों के कई बड़े धरने और आम नागरिकों के विरोध प्रदर्शन इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था और वीआईपी मूवमेंट के दबाव के चलते प्रदर्शनों को शहर के बाहरी या तयशुदा इलाकों की तरफ शिफ्ट करने का प्रयास लगातार जारी है। यही कारण है कि CJP जैसे संगठनों द्वारा दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की मांग करना प्रशासनिक फैसलों के सामने एक बड़ी चुनौती की तरह देखा जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जंतर-मंतर के आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है और हर आने-जाने वाले पर कड़ी नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से वक्त रहते निपटा जा सके।
सीजेपी की नई रणनीति और प्रशासनिक रुख
CJP की तरफ से आगामी प्रदर्शन की रूपरेखा लगभग तैयार कर ली गई है, लेकिन असली पेंच पुलिस की अनुमति और तारीख मिलने पर ही सुलझेगा। संगठन से जुड़े लोगों का तर्क है कि नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध जताने का संवैधानिक हक है और उसे मनमाने तरीके से छीना नहीं जा सकता है। दूसरी तरफ, दिल्ली पुलिस के अधिकारी इस मामले में पूरी तरह सतर्क हैं और वे कानून एवं व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेंगे। सुरक्षा के लिहाज से जंतर-मंतर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवानों की मौजूदगी बढ़ा दी गई है।
जमीन पर मौजूद हमारे संवाददाताओं ने पाया कि जंतर-मंतर के आसपास का पूरा इलाका इन दिनों छावनी में तब्दील नजर आ रहा है। स्थानीय दुकानदारों और आम राहगीरों का कहना है कि बार-बार होने वाले इन धरना-प्रदर्शनों से उनके रोजमर्रा के कामकाज पर काफी असर पड़ता है। हालांकि, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि लोकतंत्र की असली खूबसूरती संवाद और विरोध जताने की खुली छूट में ही छिपी हुई है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि दिल्ली पुलिस CJP के आवेदन पर क्या रुख अपनाती है और क्या जंतर-मंतर पर एक बार फिर कोई बड़ा राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन देखने को मिलेगा या नहीं।
राजधानी में विरोध प्रदर्शनों का बदलता स्वरूप
दिल्ली जैसे महानगर में धरने और प्रदर्शन हमेशा से सियासत और समाज का एक अहम हिस्सा रहे हैं। चाहे किसानों का आंदोलन हो, छात्रों के प्रदर्शन हों या फिर विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाने वाले संगठन, सभी के लिए जंतर-मंतर हमेशा से पहली पसंद रहा है। लेकिन अब प्रशासनिक सख्ती और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बीच इन जगहों का इस्तेमाल करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। विश्लेषकों का मानना है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच इस खींचतान का सीधा असर आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियों पर पड़ना तय है।
'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि CJP के इस नए कदम से राजधानी का सियासी पारा एक बार फिर चढ़ने लगा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दिल्ली पुलिस कल होने वाली बैठक में CJP को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की इजाजत देती है या उन्हें किसी नए तयशुदा स्थान पर जाने के लिए कहती है। जमीनी हकीकत यही है कि लोकतंत्र के इस अखाड़े में अधिकार और कानून के बीच की यह जंग अभी और लंबी चलने वाली है, जिस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।







