नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीनी हालात का जायजा लिया, तो पता चला कि सीजेपी यानी सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस के प्रदर्शन की तैयारियों को लेकर पेंच फंस गया है। आयोजकों ने अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन पुलिस की ओर से हरी झंडी न मिलने के कारण उनकी सारी योजना धरी की धरी रह गई। अब स्थिति यह है कि आयोजक खुद कह रहे हैं कि प्रदर्शन की सही तारीख और समय अब दिल्ली पुलिस ही तय करेगी।
इस पूरे मामले पर जब हमने स्थानीय जानकारों और पुलिस अधिकारियों से बात की, तो कई अहम बातें सामने आईं। पिछले कुछ महीनों में जंतर-मंतर पर होने वाले आयोजनों के नियमों में कड़ाई की गई है। सुरक्षा कारणों और ट्रैफिक व्यवस्था का हवाला देते हुए पुलिस हर छोटे-बड़े धरने पर कड़ी नजर रख रही है। बीबीसी और अन्य मीडिया संस्थानों के संवाददाताओं ने भी अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में यह दिखाया है कि कैसे जंतर-मंतर पर पुलिस का कड़ा पहरा रहता है और प्रदर्शनकारियों को अपनी बात रखने के लिए अब कई कानूनी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ता है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बदले नए नियम और वैकल्पिक स्थान
दिल्ली में धरने-प्रदर्शनों को लेकर हाल के दिनों में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब जंतर-मंतर के अलावा कुछ नए स्थानों को धरना-प्रदर्शन के लिए तय किया गया है ताकि शहर के मुख्य हिस्सों में जाम न लगे। लगभग तैंतीस साल पहले सरकार ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए अधिकृत किया था, जहां अन्ना आंदोलन से लेकर पहलवानों के बड़े धरने तक सब कुछ हुआ। लेकिन अब प्रशासन शहर की शांति और यातायात को दुरुस्त रखने के लिए जंतर-मंतर पर पाबंदियां बढ़ा रहा है और लोगों को नए तय किए गए तीन स्थानों पर जाने की सलाह दे रहा है।
इन पाबंदियों और नए नियमों के कारण राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में असंतोष भी देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अपनी आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और बार-बार जगह बदलने से आम जनता तक संदेश पहुंचने में दिक्कत आती है। सीजेपी के इस ताज़ा मामले में भी यही सवाल उठाया जा रहा है कि क्या प्रशासन विरोध प्रदर्शन के लोकतांत्रिक हक को सीमित कर रहा है। आयोजकों का अगला कदम क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि दिल्ली पुलिस उन्हें किस तारीख और किस जगह की अनुमति देती है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और पत्रकारों की प्रतिक्रियाएं
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस छिड़ी हुई है। नवभारत टाइम्स और अन्य मंचों पर सुशांत सरीन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों के इंटरव्यू और चर्चाएं वायरल हो रही हैं, जिनमें जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ और वहां आने वाले चर्चित चेहरों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोग यह पूछ रहे हैं कि ऐसे संवेदनशील प्रदर्शनों में किसे आने की इजाजत दी जानी चाहिए और किसे नहीं। इस बहस ने इस पूरे आंदोलन को मुख्यधारा की मीडिया से निकालकर सोशल मीडिया के डिबेट रूम तक पहुंचा दिया है।
द फ्रीलान्स की अंतिम पड़ताल यही कहती है कि जब तक पुलिस और आयोजकों के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता, तब तक दिल्ली के इन राजनीतिक अड्डों पर अनिश्चितता का माहौल बना रहेगा। आम नागरिक भी अब यह समझ रहे हैं कि राजधानी में किसी भी मुद्दे पर आवाज उठाने के लिए अब पहले से कहीं अधिक प्रशासनिक मंजूरियों की जरूरत पड़ती है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सीजेपी को पुलिस कौन सी तारीख देती है और क्या वे तयशुदा नियमों के दायरे में रहकर अपना विरोध दर्ज करा पाते हैं या नहीं।






