झारखंड में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और परिसीमन का गरमाता मुद्दा
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन, जातीय जनगणना और स्थानीय जातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है। हाल ही में रांची में मूलवासी सदान मोर्चा की एक अहम बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय अध्यक्ष और झारखंड आंदोलनकारी राजेंद्र प्रसाद ने की। इस बैठक में राज्य की वर्तमान राजनीतिक स्थिति, आगामी परिसीमन प्रक्रिया और मूलवासी सदानों की राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर विस्तार से मंथन किया गया।
बैठक में मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि झारखंड के मूलवासी और सदान लंबे समय से अपनी राजनीतिक उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। वक्ताओं ने कहा कि राज्य के कई इलाकों में जनसंख्या के आधार पर सदानों को विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। इसी असमानता को दूर करने के लिए अब मोर्चा ने खुलकर अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया है और केंद्र तथा राज्य सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखनी शुरू कर दी हैं।
संबंधित खबरें
जनसंख्या आधारित परिसीमन और अनारक्षित सीटों की मांग
मूलवासी सदान मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि परिसीमन की पूरी संवैधानिक प्रक्रिया का मुख्य आधार जनसंख्या होना चाहिए। यदि परिसीमन प्रक्रिया तय नियमों और सही जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर पूरी नहीं की जाती है, तो सरकार को संतुलन बनाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। मोर्चा ने मांग की है कि खूंटी, सिमडेगा, गुमला, लोहरदगा, चाईबासा और दुमका विधानसभा क्षेत्रों के मुख्यालयों को केंद्र सरकार द्वारा तुरंत अनारक्षित क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए।
मोर्चा का तर्क है कि इन खास क्षेत्रों में मूलवासी सदान समुदायों को लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ने का अपेक्षित अवसर नहीं मिल पाता है। यहाँ तक कि स्थानीय निकाय चुनावों यानी पंचायत स्तर पर भी मुखिया, प्रमुख और जिला परिषद अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर उन्हें चुनाव लड़ने में कई प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके समाधान के रूप में मोर्चा ने रांची, धनबाद, बोकारो और जमशेदपुर जैसे शहरी और औद्योगिक विधानसभा क्षेत्रों को आदिवासियों के लिए आरक्षित करने का विकल्प भी सामने रखा है ताकि सीटों का सही संतुलन बन सके।
"यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर नहीं किया जाता है और सीटों का विस्तार भी होता है, तब भी ग्रामीण क्षेत्रों में हमारे मूलवासी सदान भाइयों को उचित राजनीतिक भागीदारी कभी नहीं मिल पाएगी। इसके खिलाफ हमें एकजुट होकर अपनी आवाज उठानी होगी।" — राजेंद्र प्रसाद, केंद्रीय अध्यक्ष, मूलवासी सदान मोर्चा
सीटों के विस्तार पर भी उठ रहे हैं गंभीर सवाल
बैठक के दौरान नेताओं ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि यदि भविष्य में झारखंड विधानसभा की सीटों की संख्या 81 से बढ़ाकर 160 भी कर दी जाती है, तब भी सदानों की राजनीतिक स्थिति में कोई खास सुधार नहीं होगा। उनका आरोप है कि यदि गैर-संवैधानिक तरीके से सीटों का विस्तार और परिसीमन किया गया, तो ग्रामीण इलाकों में जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का दायरा तो बढ़ जाएगा, लेकिन शहरों में अनारक्षित सीटें बढ़ेंगी।
मोर्चा के पदाधिकारियों का मानना है कि इस प्रक्रिया का गलत फायदा बाहरी लोगों और आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग के लोगों को मिल सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राज्य के मौजूदा सांसद, विधायक और विभिन्न राजनीतिक दल केवल वोट बैंक की राजनीति के डर से इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर खुलकर कुछ बोलने से बच रहे हैं। कोई भी नेता खुलकर मूलवासी सदानों के अधिकारों की बात संसद या विधानसभा में उठाने का साहस नहीं कर पा रहा है।
जातीय जनगणना में ओबीसी कॉलम और आगे की रणनीति
परिसीमन के अलावा बैठक में आगामी जातीय जनगणना के दौरान ओबीसी कॉलम को स्पष्ट रूप से शामिल किए जाने की जोरदार मांग उठाई गई। वक्ताओं ने कहा कि सही आंकड़ों के बिना किसी भी समुदाय के विकास की योजनाएं धरातल पर सफल नहीं हो सकतीं। धनंजय कुमार राय, विश्वनाथ गोप और मुमताज खान जैसे प्रमुख नेताओं ने एक स्वर में कहा कि अब समय आ गया है कि मूलवासी सदान अपने अधिकारों के लिए चुप बैठने के बजाय एक निर्णायक और आर-पार के संघर्ष की तैयारी करें।
मोर्चा ने यह भी निर्णय लिया है कि बहुत जल्द पूरे राज्यभर से मूलवासी सदानों को राजधानी रांची बुलाया जाएगा। रांची में एक विशाल राज्यस्तरीय सम्मेलन या रैली आयोजित करके इस पूरे मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श किया जाएगा और उसके बाद सरकार के खिलाफ आगे की रणनीतिक घोषणा की जाएगी। यह आंदोलन आने वाले समय में झारखंड की सियासत को एक नया मोड़ दे सकता है, क्योंकि राज्य में चुनाव के लिहाज से सदान मतदाता एक बहुत बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
निष्कर्ष और भविष्य की राजनीतिक हलचल
झारखंड में मूलवासी सदान मोर्चा की यह सक्रियता संकेत देती है कि राज्य में स्थानीय अधिकारों और पहचान की राजनीति अभी थमने वाली नहीं है। जैसे-जैसे परिसीमन और जनगणना जैसे राष्ट्रीय व प्रांतीय मुद्दे आगे बढ़ेंगे, राजनीतिक दलों पर इन समुदायों की मांगों को पूरा करने का दबाव और अधिक बढ़ता जाएगा। देखना यह होगा कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार इस गंभीर सामाजिक मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या आने वाले दिनों में इन छह विधानसभा क्षेत्रों के स्वरूप में कोई बदलाव देखने को मिलता है।




