कठुआ, जम्मू-कश्मीर: 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में स्थित केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के एक कैंप में उस वक्त हड़कंप मच गया जब आपसी बहस और विवाद ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया। इस भीषण गोलीबारी की घटना में एक असिस्टेंट कमांडेंट समेत चार जवानों की दर्दनाक मौत हो गई है। घटना के बाद से सुरक्षा एजेंसियों और बल के भीतर हड़कंप मचा हुआ है, और कैंप के अंदर के सुरक्षा तंत्र व जवानों के मानसिक तनाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
खून से सनी छावनी: क्या है शुरुआती घटनाक्रम?
प्राप्त शुरुआती रिपोर्टों और क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार, घटना कठुआ के एक स्थापित CISF कैंप के भीतर घटी। ड्यूटी के दौरान या बैरक के आसपास किन्हीं आपसी मुद्दों को लेकर कुछ जवानों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई थी। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि एक उत्तेजित जवान ने अपनी सर्विस राइफल निकाल ली और अपने ही साथियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इस अचानक हुए हमले में असिस्टेंट कमांडेंट स्तर के अधिकारी समेत चार कर्मियों को गंभीर गोलियां लगीं, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
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मृतकों में उच्चाधिकारी भी शामिल
इस गोलीबारी की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल सिपाही स्तर के जवान ही नहीं, बल्कि नेतृत्व कर रहे अधिकारी भी इसकी चपेट में आ गए। शुरुआती पुष्टि के अनुसार, मरने वालों में एक असिस्टेंट कमांडेंट भी शामिल हैं, जो कैंप में प्रशासनिक और ऑपरेशनल कमान संभाल रहे थे। इस तरह के आंतरिक संघर्ष में एक अधिकारी की मौत होना बल के भीतर अनुशासन, आपसी तालमेल और मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक तनाव का गंभीर मुद्दा
'द फ्रीलान्स' के विश्लेषण के मुताबिक, सुरक्षा बलों के भीतर इस तरह की 'फ्रेसाइड' (साथी द्वारा साथी पर हमला) की घटनाएं पिछले कुछ वर्षों में एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बनती जा रही हैं। कड़े अनुशासन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, लगातार ड्यूटी के दबाव और परिवार से लंबे समय तक दूर रहने के कारण कई बार सुरक्षाकर्मी गंभीर मानसिक तनाव या डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। कठुआ की यह घटना एक बार फिर इस बात की मांग करती है कि अर्धसैनिक बलों के शिविरों में नियमित रूप से 'काउंसलिंग सेशन' और तनाव मुक्ति शिविर आयोजित किए जाने चाहिए।
प्रशासनिक जांच और आगे की कार्रवाई
घटना की सूचना मिलते ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, CISF के उच्चाधिकारी और फॉरेंसिक टीमें तुरंत मौके पर पहुंच गईं। कैंप को पूरी तरह सील कर दिया गया है और घटना स्थल से साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह पता लगाने के लिए एक उच्चस्तरीय कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी (Court of Inquiry) बैठा दी गई है कि आखिरकार वह तात्कालिक कारण क्या था, जिसने एक अनुशासित जवान को इस खौफनाक कदम को उठाने पर मजबूर कर दिया। इस मामले में आगे की कानूनी और विभागीय कार्रवाई तेजी से जारी है।
निष्कर्ष
कठुआ CISF कैंप की यह त्रासदी केवल चार जवानों की मौत का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे सुरक्षा तंत्र के भीतर की उन अदृश्य दरारों को उजागर करती है जिन पर पर्दा डालना अब और संभव नहीं है। एक सजग और संवेदनशील समाज के रूप में यह जरूरी है कि हम जवानों की शारीरिक सुरक्षा के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दें।








