बगदाद/द फ्रीलान्स डेस्क: पश्चिम एशिया की सुलगती आग अब ऐसे मुकाम पर आ पहुंची है जहां से परदे के पीछे का खेल खुलकर सामने आ रहा है। इराक की धरती पर अमेरिका और सऊदी अरब की कथित साझा सैन्य कार्रवाई ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि क्षेत्रीय संघर्ष अब छद्म युद्ध (Proxy War) से निकलकर सीधे टकराव में बदल चुका है। ईरान समर्थित मिलिशिया के ठिकानों पर हुए इन हमलों ने न सिर्फ भारी तबाही मचाई है, बल्कि कूटनीतिक गलियारों में भी भूचाल ला दिया है।
ईरानी ड्रोन हमलों का सीधा और आक्रामक जवाब
हमारी फील्ड रिपोर्ट और शुरुआती इनपुट बताते हैं कि अमेरिकी अड्डों पर लगातार हो रहे ड्रोन हमलों के बाद वाशिंगटन और रियाद ने यह बड़ा कदम उठाया है। रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य के पास सुरक्षा समीकरणों को साधने के लिए सऊदी अरब और अमेरिका ने संयुक्त रूप से मिसाइलें दागीं। इस कार्रवाई का मुख्य निशाना इराक के भीतर सक्रिय वे सशस्त्र गुट थे जिन्हें तेहरान का सीधा समर्थन प्राप्त है।
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रक्तपात और जमीनी तबाही: 18 लड़ाकों की मौत
जमीनी रिपोर्टों के अनुसार, इन हवाई हमलों की तीव्रता इतनी भीषण थी कि कई इलाकों में भारी तबाही मची है। आधिकारिक और स्थानीय सूत्रों से मिले आंकड़ों के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 18 लड़ाके मारे गए हैं जबकि 32 अन्य गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं। इराकी क्षेत्रों में हुए इस खून-खराबे के बाद स्थानीय आबादी में भारी दहशत का माहौल है। आसमान में लगातार गश्त कर रहे लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट ने युद्ध के उस खौफ को जिंदा कर दिया है, जिसकी आशंका पिछले कई महीनों से जताई जा रही थी।
'हमें कोई खबर नहीं थी': इराक की संप्रभुता पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का एक और विवादास्पद पहलू बगदाद और पश्चिमी ताकतों के बीच बढ़ता टकराव है। अमेरिकी बयानों और दावों के उलट, इराक सरकार ने साफ कर दिया है कि उन्हें इन हमलों की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और न ही इसकी कोई मंजूरी दी गई थी। बगदाद का यह रुख साफ करता है कि विदेशी ताकतों द्वारा उसकी संप्रभुता की अनदेखी की जा रही है, जिससे आने वाले दिनों में इराक की घरेलू राजनीति और अस्थिर हो सकती है।
वैश्विक कूटनीति और भारत पर संभावित असर
सऊदी अरब का इस युद्ध में सीधे तौर पर कूदना इस बात का संकेत है कि खाड़ी देशों के पारंपरिक समीकरण बदल रहे हैं। तेल आपूर्ति मार्गों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से बेहद संवेदनशील इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ना तय है। 'द फ्रीलान्स' की विशेष पड़ताल बताती है कि यदि यह संघर्ष थमता नहीं है, तो ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों प्रवासियों की सुरक्षा को लेकर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की चिंताएं भी तेजी से बढ़ेंगी।








