भारतीय सिनेमा जगत में अपनी बेबाक शैली, अनूठे विषयों और क्रांतिकारी सोच के लिए पहचाने जाने वाले फिल्ममेकर महेश भट्ट का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर बॉलीवुड के शीर्ष निर्देशकों की सूची में शामिल होने तक का उनका सफर बेहद रोमांचक और संघर्षों से भरा रहा है। आज भले ही वे अपनी फिल्मों और विचारों को लेकर चर्चा में रहते हैं, लेकिन इस मुकाम को हासिल करने के लिए उन्होंने जीवन में कड़ी मेहनत और कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।
संघर्ष के शुरुआती दिन और सेक्रेटरी की नौकरी
हर सफल शख्सियत के पीछे एक लंबा संघर्ष छिपा होता है, और महेश भट्ट की कहानी भी इससे अलग नहीं है। रोजगार की तलाश और जीवन की अनिश्चितताओं के बीच उन्होंने शुरुआत में कई छोटे-मोटे काम किए। अपने करियर के शुरुआती दौर में महेश भट्ट ने अभिनेत्री स्मिता पाटिल और अभिनेता विनोद खन्ना के सेक्रेटरी के रूप में भी काम किया था। इस दौरान उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के अंदरूनी कामकाज को बहुत करीब से देखा और समझा, जिसने आगे चलकर उनके निर्देशन के सफर में एक मजबूत आधार का काम किया।
सिनेमा के प्रति उनका जुनून ऐसा था कि वे हर छोटी-बड़ी बारीकी को बहुत गौर से सीखते थे। उस दौर में उनके पास न तो कोई बड़ा फिल्मी गॉडफादर था और न ही कोई भारी-भरकम पूंजी, थी तो बस कुछ कर दिखाने की जिद और हाथ में कलम की ताकत। इसी के दम पर उन्होंने आगे बढ़ने का फैसला किया और धीरे-धीरे मायानगरी में अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू कर दी।
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महज 26 साल की उम्र में बतौर निर्देशक किया डेब्यू
महेश भट्ट ने अपने फिल्मी करियर की आधिकारिक शुरुआत साल 1970 में आई डॉक्यूमेंट्री 'संकट' के निर्देशन से की थी। हालांकि, एक फुल-फ्लालेज निर्देशक के रूप में उनकी शुरुआत साल 1974 में आई फिल्म 'मंजिलें और भी हैं' से हुई। जब उन्होंने इस फिल्म का निर्देशन किया, तब उनकी उम्र महज 26 साल थी। इतनी कम उम्र में किसी जटिल विषय पर फिल्म बनाना हर किसी के बस की बात नहीं होती, लेकिन महेश भट्ट ने अपनी पहली ही फिल्म से यह साबित कर दिया कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं।
इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपने पांच दशक से अधिक के लंबे करियर में कई सुपरहिट फिल्मों का निर्देशन किया, सैकड़ों फिल्मों की पटकथा लिखी और कई फिल्मों का निर्माण भी किया। उन्होंने 'अर्थ', 'सारांश', 'आशिकी', 'दिल है कि मानता नहीं' और 'हम हैं राही प्यार के' जैसी कई बेहतरीन फिल्में दी हैं, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं।
'सारांश' और 'नाम' ने दिलाई इंडस्ट्री में खास पहचान
महेश भट्ट के निर्देशन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे लीक से हटकर फिल्में बनाने में विश्वास रखते थे। उनकी फिल्म 'सारांश' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसमें एक वृद्ध दंपत्ति के अकेलेपन और संघर्ष की कहानी को बेहद संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा गया था। इस फिल्म को 14वें मॉस्को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शित किया गया था और यह उस साल सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) के वास्ते भारत की आधिकारिक प्रविष्टि थी।
"सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज के भीतर झांकने और उन सच्चाइयों को सामने लाने का एक आईना है, जिन्हें अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं।" — महेश भट्ट, फिल्म निर्देशक
इसके बाद, साल 1986 में आई फिल्म 'नाम' उनके करियर की पहली बड़ी व्यावसायिक और समीक्षात्मक रूप से सफल फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के गाने और संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इसके जरिए उन्होंने व्यावसायिक सफलता और कलात्मकता का एक बेहतरीन संतुलन पेश किया, जिसे दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया।
छोटे पर्दे पर भी दिखाया अपनी प्रतिभा का दम
बड़े पर्दे पर अपनी सफलता का परचम लहराने के बाद, महेश भट्ट ने छोटे पर्दे यानी टेलीविजन की दुनिया का भी रुख किया। नब्बे के दशक में जब भारतीय टेलीविजन का विस्तार हो रहा था, तब उन्होंने कई लोकप्रिय धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया। 'स्वाभिमान', 'कभी कभी' और 'नामकरण' जैसे चर्चित टीवी सीरियल्स ने दर्शकों के बीच खूब लोकप्रियता हासिल की। उनके सीरियल्स की कहानियां भी समाज के वास्तविक जीवन के काफी करीब हुआ करती थीं, जिससे आम दर्शक आसानी से जुड़ जाते थे।
निजी जिंदगी का अक्स और बोल्ड विषयों पर पकड़
महेश भट्ट एक ऐसे फिल्मकार हैं जिनकी निजी जिंदगी और विचार अक्सर चर्चा का विषय रहे हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों में अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों और अंतर्द्वंद्वों का खुलकर प्रतिबिंब दिखाया है। सत्तर और अस्सी के दशक में जब समाज में कई विषयों पर खुलकर बात करने से लोग कतराते थे, तब महेश भट्ट ने उन बोल्ड और वर्जित विषयों पर फिल्में बनाईं, जिन पर लोग केवल दबी जुबान में चर्चा करते थे।
उनकी फिल्मों में रिश्तों की उलझनें, मानवीय संवेदनाएं और समाज के कड़वे सच पूरी बेबाकी से नजर आते थे। आलोचनाओं से बेफिक्र होकर नए प्रयोग करने की उनकी आदत ने ही उन्हें एक साधारण से युवा से देश का दिग्गज फिल्म निर्देशक बनाया। आज भी उनका यह सफर और संघर्ष उन तमाम युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो फिल्म इंडस्ट्री में अपनी मेहनत के दम पर कुछ बड़ा करना चाहते हैं।







