अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की प्रयोगशाला में अक्सर ऐसे मोड़ आते हैं, जो सतह पर सामान्य दिखते हैं लेकिन उनकी गहराई में भू-राजनीतिक उथल-पुथल छिपी होती है। पिछले कुछ महीनों से दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बर्फ पिघलने के दावे किए जा रहे थे। ढाका में बैठे नीति-निर्माता और इस्लामाबाद के राजनयिक एक नई शुरुआत की इबारत लिख रहे थे, लेकिन एक ताजा घटनाक्रम ने इस तथाकथित दोस्ती के दावों की हवा निकाल दी है। पाकिस्तान ने अचानक कुछ ऐसा कर दिया जिसे कूटनीतिक हलकों में 'गच्चा' देना कहा जा रहा है। जब इस अप्रत्याशित कदम पर सवाल उठे, तो इस्लामाबाद के विदेश मंत्रालय ने झेंप मिटाते हुए इसे महज एक 'टेक्निकल मामला' बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की।
ढाका की उम्मीदों को झटका और कूटनीतिक अविश्वास
द फ्रीलान्स की फील्ड इन्वेस्टिगेशन और diplomatic sources से मिले इनपुट बताते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार, आवाजाही और ऐतिहासिक गिले-शिकवे दूर करने को लेकर जो गुप्त और खुली बैठकें हुईं थीं, उन पर इस ताजा विवाद ने पानी फेर दिया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और वहां के राजनीतिक दल पाकिस्तान के इस यू-टर्न से असहज हैं। ढाका में यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या इस्लामाबाद की नीयत वास्तव में रिश्तों को सामान्य करने की है, या यह केवल कूटनीतिक पासा फेंकने की कोई रणनीति है? पाकिस्तान द्वारा ऐन मौके पर कदम पीछे खींच लेने से बांग्लादेशी हुक्मरानों को घरेलू मोर्चे पर भी असहजता का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वहां की आवाम पाकिस्तानी सेना के 1971 के अत्याचारों के इतिहास को भूली नहीं है।
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'तकनीकी मामला' या कूटनीतिक बहानेबाजी?
जब पाकिस्तानी राजनयिकों से इस अप्रत्याशित फेरबदल पर जवाब तलब किया गया, तो उनका रटा-रया जवाब सामने आया— 'यह एक तकनीकी समस्या है।' लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह केवल एक तकनीकी बहाना है। असल में, पाकिस्तान की घरेलू आर्थिक बदहाली, वहां की शक्तिशाली सेना के अपने समीकरण और भारत के साथ क्षेत्रीय संतुलन के चलते इस्लामाबाद अपने ही बुने हुए कूटनीतिक जाल में फंस गया है। जब फैसलों को जमीन पर उतारने का वक्त आया, तो पाकिस्तानी तंत्र अपनी आंतरिक प्राथमिकताओं के आगे झुक गया, जिससे बांग्लादेश को दिया गया भरोसा टूट गया।
क्षेत्रीय अशांति और अफगान नागरिकों की रहस्यमयी मौतें
इसी बीच, पाकिस्तान के भीतर से आ रही अन्य खबरें भी वहां की कानून-व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों की पोल खोल रही हैं। हाल ही में पाकिस्तान की एक नदी से तीन अफगान नागरिकों के शव मिलने से सनसनी फैल गई है। स्थानीय पुलिस इस गुत्थी को सुलझाने में जुटी है कि आखिर वे अफगान नागरिक उस इलाके तक पहुंचे कैसे और उनकी मौत के पीछे किन ताकतों का हाथ है। यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान खुद आंतरिक मोर्चे पर कितना अशांत है। जब एक देश अपनी सीमाओं के भीतर शरणार्थियों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा, तब वह पड़ोसी देशों के साथ किए गए कूटनीतिक वादों को कैसे निभा सकता है?
भविष्य का भू-राजनीतिक असर
दक्षिण एशिया के इस घटनाक्रम का असर आने वाले समय में व्यापक रूप से दिखाई देगा। बांग्लादेश अब पाकिस्तान के साथ किसी भी समझौते या बातचीत में अत्यधिक सावधानी बरतने की मुद्रा में आ गया है। ढाका समझ चुका है कि इस्लामाबाद के बयानों और वास्तविक नीतियों में जमीन-आसमान का फर्क है। दूसरी ओर, भारत की नजरें भी इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत विरोधी ताने-बाने बुनने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन पाकिस्तान की लचर कार्यप्रणाली और बार-बार के यू-टर्न उसके खुद के क्षेत्रीय सहयोगियों को उससे दूर कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांग्लादेश इस 'तकनीकी गच्चे' का क्या कूटनीतिक जवाब देता है, और क्या इस्लामाबाद अपनी विश्वसनीयता बचाने में कामयाब हो पाता है या नहीं।










