पंजाब में पराली (धान के अवशेष) जलाने और उससे फैलने वाले प्रदूषण के गंभीर मुद्दे पर 'आजतक पंचायत पंजाब' के मंच पर किसान नेताओं के विचार आपस में टकरा गए। कार्यक्रम के दौरान जब रिपोर्टर ने पराली प्रबंधन और जहरीली हवा को लेकर सवाल किया, तो किसान नेताओं की अलग-अलग राय सामने आई और वे मंच पर ही एक-दूसरे के तर्कों को काटने लगे।
कार्यक्रम के दौरान किसानों पर बढ़ते कर्ज, एमएसपी (MSP) और बार-बार होने वाले आंदोलनों पर भी खुलकर चर्चा हुई। किसान नेताओं ने एक सुर में कहा कि जब सरकारें सुनवाई बंद कर देती हैं, तब मजबूरन किसानों को आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ता है। हालांकि, सबसे तीखी बहस पराली जलाने के कारणों और उसके समाधान को लेकर देखने को मिली।
पराली जलाने के कारणों पर किसान नेताओं में छिड़ी बहस
पंजाब किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष सुखवंत सिंह टिल्लू ने पराली जलाने को लेकर किसानों और किसान यूनियनों की कार्यशैली पर सवाल उठाए। टिल्लू ने कहा कि आज का किसान लेबर पर पूरी तरह निर्भर हो गया है और मेहनत से बचकर आसानी से काम निपटाने के लिए खेतों में आग लगा देता है। उन्होंने कहा कि किसान यूनियनों को सिर्फ आंदोलन करने के बजाय गांवों में जाकर किसानों और युवाओं को जागरूक करना चाहिए।
सुखवंत सिंह टिल्लू के इन बयानों पर पलटवार करते हुए भारतीय किसान यूनियन के महासचिव हरिंदर सिंह लखोवाल ने सारा दोष एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और महंगी मशीनों पर मढ़ दिया। लखोवाल ने कहा कि 1990 के दशक में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी और पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (PAU) ने ही कटर से धान काटकर फंगस खत्म करने के लिए आग लगाने की सलाह दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि 50% सब्सिडी के बाद भी पराली प्रबंधन के उपकरण इतने महंगे हैं कि छोटे किसान उन्हें नहीं खरीद सकते।
सरवण सिंह पंधेर ने की सीधी आर्थिक मदद की मांग
किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता सरवण सिंह पंधेर ने पराली न जलाने के लिए सीधे आर्थिक मदद (कैश सब्सिडी) की मांग रखी। पंधेर ने कहा कि पंजाब के छोटे किसानों के पास भारी-भरकम ट्रैक्टर या साधन नहीं हैं। सरकार को पराली प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 3,000 रुपये की डायरेक्ट सब्सिडी देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक किसानों को सीधा वित्तीय सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक मजबूरी में आग लगाने की घटनाएं पूरी तरह बंद नहीं हो सकतीं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मीडिया मंचों पर चर्चा में आए इस वीडियो व बयानों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। यह विषय वर्तमान में व्यापक सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वीडियो साभार: संबंधित सोशल मीडिया हैंडल / न्यूज प्लेटफॉर्म।
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