नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों सन्नाटा पसरा रहता है या फिर वहां पुलिस के पहरे कड़े नजर आते हैं। कभी यह जगह देश भर से आने वाले किसानों, छात्रों, मजदूरों और आम नागरिकों की बुलंद आवाजों का केंद्र हुआ करती थी। लोग अपनी समस्याएं लेकर यहां सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने आते थे। लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह से प्रदर्शनकारियों को रोकने के नियम बनाए गए हैं, उसने एक नए हालात को जन्म दिया है। जानकारों का कहना है कि अब विरोध जताने के लिए भी पहले प्रशासन से लंबी और जटिल इजाज़त लेनी पड़ती है। इस स्थिति को मीडिया रिपोर्ट्स में 'इजाज़त का गणतंत्र' नाम दिया गया है, जहां बिना अनुमति के सांस लेना भी गुनाह सा बन गया है।
इस पूरे हालात का सबसे बुरा असर उन आम लोगों पर पड़ रहा है जिनकी सुनने वाला कोई बड़ा मंच नहीं होता। जब कोई पीड़ित समूह अपनी मांग लेकर दिल्ली पहुंचता है, तो उन्हें अक्सर रास्ते में ही रोक दिया जाता है। कभी धारा 144 का हवाला दिया जाता है, तो कभी सुरक्षा कारणों का बहाना बनाकर बसों में भरकर लोगों को दूर के थानों में ले जाया जाता है। राजधानी की सड़कों पर यह दृश्य आम हो चला है कि जनता अपने ही देश में अपनी बात कहने के लिए दर-दर भटक रही है। सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना या अपनी असहमति जताना अब अपराध की श्रेणी में आता जा रहा है।
प्रशासनिक पाबंदियों और अनुमति के नाम पर बढ़ता तनाव
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकने के मामले सिर्फ एक बानगी हैं, देश के दूर-दराज इलाकों से भी ऐसी ही कई प्रशासनिक अड़चनों की खबरें आ रही हैं। पूर्वोत्तर के राज्य अरुणाचल प्रदेश से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है जहां ईसाई समुदायों के लोगों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम ने गंभीर आरोप लगाया है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के सॉफ्टवेयर में कुछ ऐसी तकनीकी खामियां या जानबूझकर बनाई गई पाबंदियां हैं। इसके कारण ईसाई आवेदकों को अपने फॉर्म में अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का विकल्प चुनने में दिक्कत आ रही है। बैंक का यह सॉफ्टवेयर आवेदनों को आगे नहीं बढ़ा रहा है, जिससे समुदाय के युवाओं में भारी रोष व्याप्त है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की तकनीकी बाधाएं सीधे तौर पर उनके संवैधानिक अधिकारों पर हमला हैं। बैंक जैसे वित्तीय और सार्वजनिक संस्थानों के सॉफ्टवेयर में यदि इस प्रकार के विकल्प गायब मिलेंगे, तो आम नागरिक कहां न्याय की गुहार लगाएगा। इस मामले में अभी तक बैंक की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आया है, लेकिन प्रभावित लोग लगातार स्थानीय प्रशासन के सामने अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे हैं। एक तरफ जहां दिल्ली में जंतर-मंतर पर बैठने की इजाज़त नहीं मिलती, वहीं दूसरी तरफ ऐसे सॉफ्टवेयर और प्रशासनिक नियम लोगों को रोजमर्रा के कामों में भी उलझा रहे हैं।
दावणगेरे ज़िला प्रशासन पर दबाव और मतदाता सूची की सियासत
विरोध और अधिकारों के इस पूरे ताने-बाने में कर्नाटक से आया एक और बड़ा मामला चुनावी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। कर्नाटक के दावणगेरे जिले में एसआईआर यानी विशेष प्रशासनिक समीक्षा के दौरान स्थानीय प्रशासन पर गंभीर दबाव बनाए जाने की बात सामने आई है। खुद जिले के उपायुक्त ने इस बात को स्वीकार किया है कि उन पर और उनके अमले पर करीब तीन हजार नाम मतदाता सूची से हटाने का भारी दबाव था। जब स्थानीय प्रशासन को ऐसे अनुचित आदेशों को मानने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इससे जनता का सरकारी तंत्र से भरोसा उठने लगता है। लोकतंत्र की नींव निष्पक्ष चुनाव और स्वतंत्र मतदाता सूचियों पर टिकी होती है, और यदि वहां भी इस तरह की हेराफेरी की कोशिश हो, तो यह बेहद खतरनाक संकेत है।
इन सभी घटनाओं को अगर एक साथ जोड़कर देखा जाए तो एक बहुत साफ तस्वीर उभर कर सामने आती है। चाहे वह जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति का मामला हो, अरुणाचल में बैंक सॉफ्टवेयर के जरिए अधिकारों को रोकने की बात हो, या फिर कर्नाटक में मतदाता सूची से नाम काटने का प्रशासनिक दबाव हो। इन सबका मूल मकसद एक ही नजर आता है—आम आदमी की आवाज और उसकी पहचान को कमजोर करना। जब नागरिक अपनी बुनियादी मांगों के लिए सड़कों पर उतरता है, तो उसे अनुमति के जाल में उलझा दिया जाता है। और जब वह प्रशासनिक या वित्तीय तंत्र से न्याय मांगता है, तो वहां भी उसे बाधाएं मिलती हैं।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और आगे की राह
हमारी इस जमीनी पड़ताल से यह साफ होता है कि देश में असहमति जताने के लोकतांत्रिक स्पेस लगातार सिमटते जा रहे हैं। नागरिक अधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि विरोध करने का अधिकार किसी भी जीवंत लोकतंत्र की ऑक्सीजन होता है। यदि आप जनता के विरोध करने के हक को छीन लेंगे, तो समाज के भीतर गुस्सा और घुटन बढ़ेगी जो किसी भी देश के हित में नहीं हो सकती। जंतर-मंतर के गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी और बंद दरवाजे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि सरकारें अब आलोचना सुनने के बजाय उसे नजरअंदाज करना या कुचलना ज्यादा बेहतर समझ रही हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या देश के नागरिक अपने इन बुनियादी अधिकारों को बचाने के लिए किसी बड़े कानूनी और सामाजिक मंच का सहारा लेते हैं या नहीं। स्थानीय अदालतों और उच्च न्यायालयों में भी अब ऐसे मामलों की संख्या बढ़ रही है जहां लोग प्रदर्शन की इजाज़त न मिलने पर न्याय की गुहार लगा रहे हैं। द फ्रीलान्स अपनी इस खोजी पत्रकारिता के जरिए देश के कोने-कोने से ऐसी हर उस खबर को सामने लाता रहेगा जो आम आदमी के अधिकारों से जुड़ी है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी है कि हर नागरिक की आवाज बिना किसी डर और बिना किसी प्रशासनिक रोक-टोक के सही जगह तक पहुंचे।










