उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानों का दौर लगातार जारी है। इस बीच, निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी (सपा) और पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। संजय निषाद ने सीधे तौर पर सपा के कार्यसंस्कृति और नेतृत्व पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि आज की राजनीति में गरीबों के वोटों का इस्तेमाल सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा है, जबकि असल हकदार हाशिए पर खड़े हैं।
विचारधारा और गरीबों की हकीकत पर सवाल
संजय निषाद ने लखनऊ में एक बयान के दौरान कहा कि देश हमेशा विचारधारा से चलता है और लोकतंत्र की मूल शुरुआत इस सोच के साथ हुई थी कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा गरीब आदमी भी देश का राजा बने। लेकिन, दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि गरीबों के वोटों और उनके समर्थन के बल पर बड़े पदों पर पहुंचने वाले नेता आज उन्हीं गरीबों को भूल चुके हैं।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाले दलों ने 27 प्रतिशत आरक्षण के बड़े हिस्से पर कथित तौर पर अकेले कब्जा कर लिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि इस व्यवस्था में बाकी पिछड़ी जातियों और 'अदर मैन' की वास्तविक हिस्सेदारी कहां गायब हो गई है। निषाद के मुताबिक, जब तक राजनीति में वास्तविक न्याय नहीं होगा, तब तक वंचित समाज का भला संभव नहीं है।
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कार्यकर्ताओं की मेहनत बनाम नेताओं का एसी कल्चर
संजय निषाद ने राजनीतिक दलों के भीतर कार्य करने वाले जमीनी कार्यकर्ताओं की स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी राजनीतिक दल या आंदोलन की असली रीढ़ उसका जमीनी कार्यकर्ता होता है, जो पूरी ईमानदारी और संकल्प के साथ मैदान में डटा रहता है।
उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “आज की राजनीति का कड़वा सच यह है कि समर्पित कार्यकर्ता चिलचिलाती धूप में खड़े रहकर कुर्सियां और दरी बिछाते हैं, जबकि बड़े नेता ठंडे एसी कमरों में बैठकर सिर्फ हाथ हिलाना जानते हैं।” निषाद ने उस पुरानी मांग और नारे को भी याद दिलाया जिसके तहत कहा गया था कि 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी' होनी चाहिए। लेकिन धरातल पर कुछ ही लोग सब पर भारी पड़ गए और बाकी समाज के लोग पीछे छूट गए।
अखिलेश यादव की लग्जरी यात्रा पर निशाना
संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी की हालिया राजनीतिक यात्राओं और अखिलेश यादव की जीवनशैली को लेकर भी घेराबंदी की। उन्होंने कहा कि यात्रा निकालना हर राजनीतिक दल और नेता का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि वह यात्रा किसके लिए और कैसे निकाली जा रही है।
“यात्रा अगर वास्तव में गरीबों और पिछड़ों के कल्याण के लिए है, तो उसे सड़क के रास्ते केवल गाड़ियों के काफिले तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सीधे गरीब की तंग गलियों और झोपड़ियों तक पहुंचनी चाहिए। जब तक नेता खुद जनता के बीच जाकर उनकी जमीनी हकीकत नहीं समझेगा, तब तक न्याय नहीं हो सकता।” — डॉ. संजय निषाद, कैबिनेट मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार
उन्होंने अखिलेश यादव के महंगे और लग्जरी वाहनों के इस्तेमाल पर भी तंज कसा। निषाद ने कहा कि एक तरफ तो साइकिल की सवारी और गरीबों की बात की जाती है, लेकिन दूसरी तरफ बड़ी-बड़ी लग्जरी गाड़ियों में सफर किया जाता है। जनता कथनी और करनी के इस भारी अंतर को बहुत अच्छी तरह समझती है और सही समय पर इसका जवाब भी देती है।
लोकतंत्र और गरीबों के अधिकारों की वकालत
कैबिनेट मंत्री ने कहा कि देश का लोकतंत्र और संसद-विधानसभाएं राजा-महाराजाओं या ऐशो-आराम के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए उजड़ने वाले, संघर्ष करने वाले और भूमिहीन गरीबों के लिए बनाई गई थीं। राजनीति का मूल उद्देश्य जनसेवा और समाज के दबे-कुचलों को मुख्यधारा में लाना है, न कि राजनीतिक पदों के जरिए अपनी निजी सुख-सुविधाएं जुटाना।
संजय निषाद के इस आक्रामक तेवर से राज्य की सियासत में एक बार फिर पिछड़ों के वोटों और उनकी नुमाइंदगी को लेकर बहस छिड़ गई है। आगामी चुनावों के मद्देनजर विभिन्न दल अपनी रणनीतियों को धार दे रहे हैं, ऐसे में इस तरह के बयान राजनीतिक समीकरणों पर गहरा असर डाल सकते हैं। जनता अब विकास, हकीकत और दावों के बीच के फर्क को परख रही है और सभी राजनीतिक दलों को अपनी कार्यशैली पर आत्मમंथन करने की जरूरत है।





