देश में चुनाव आयोग के शीर्ष पदों पर नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी 'इंडिया' ब्लॉक की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है। इस याचिका में चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया और हाल ही में बने नए कानून के तहत हुई नियुक्तियों को चुनौती दी गई है। देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले पर सुनवाई करने जा रही है। इस सुनवाई पर पूरे देश की राजनीतिक और प्रशासनिक नजरें टिकी हुई हैं।
शीर्ष अदालत में दायर याचिका के मुख्य बिंदु और आपत्तियां
विपक्षी गठबंधन ने अपनी याचिका में चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। याचिका में कहा गया है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग का होना बहुत जरूरी है। जब तक चुनाव आयुक्तों का चयन पूरी तरह निष्पक्ष नहीं होगा, तब तक चुनावी प्रक्रिया पर जनता का पूरा भरोसा नहीं बन पाएगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए कानून में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर रखा गया है। विपक्ष का आरोप है कि इस व्यवस्था से केंद्र सरकार को चयन में एकतरफा अधिकार मिल गया है। इससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
"लोकतंत्र की बुनियाद निष्पक्ष चुनाव आयोग पर टिकी है। अगर संस्थाओं की स्वतंत्रता से समझौता होगा, तो लोकतंत्र कमजोर होगा।"
— राहुल गांधी, वरिष्ठ कांग्रेस नेता
नए कानून और चयन समिति के ढांचे को लेकर क्यों है विवाद?
संसद ने पिछले दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम पारित किया था। इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों को चुनने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है। इस समिति में देश के प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।
विपक्ष का कहना है कि तीन सदस्यों वाली इस समिति में सरकार के पास हमेशा दो सदस्यों का बहुमत रहेगा। इससे सरकार अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को आयोग में नियुक्त कर सकती है। विपक्ष चाहता है कि समिति में देश के मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी चयन समिति में सीजेआई को रखने का ऐतिहासिक फैसला दिया था।
विपक्षी दलों की आपत्तियां और संवैधानिक चिंताएं
राहुल गांधी और विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है। इसकी जिम्मेदारी पूरे देश में स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव कराने की होती है। यदि इसके अधिकारियों का चयन केवल सत्ताधारी दल के प्रभाव में होगा, तो आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि वह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा करे। साथ ही यह सुनिश्चित करे कि चयन समिति में न्यायिक संतुलन बना रहे। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव संस्थाओं की साख सर्वोपरि है।
केंद्र सरकार का पक्ष और कानूनी तर्क
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का रुख इस मामले में बिल्कुल साफ रहा है। सरकार का कहना है कि संसद को संविधान के तहत कानून बनाने का पूरा अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 324(2) में संसद को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने की शक्ति दी गई है।
सरकार का तर्क है कि जब तक संसद का कोई कानून नहीं था, तब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश लागू था। अब संसद ने विधिवत कानून बनाकर एक स्पष्ट प्रक्रिया तय कर दी है। सरकार के अनुसार, सर्च कमेटी नामों की सूची तैयार करती है और फिर चयन समिति विचार करके राष्ट्रपति को सिफारिश भेजती है। इसमें कोई असंवैधानिक बात नहीं है।
लोकतंत्र और चुनावी शुचिता पर इस कानूनी लड़ाई का प्रभाव
भारत में चुनाव सुधारों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। टीएन शेषन के दौर के बाद से चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर आम जनता में काफी भरोसा बढ़ा था। जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह तय होगा कि भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं की निगरानी और चयन का ढांचा किस तरह काम करेगा।
अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर कोई अंतरिम आदेश जारी करता है, तो इसका असर चुनाव आयोग के संचालन पर पड़ सकता है। वहीं, यदि अदालत कानून को बरकरार रखती है, तो सरकार की नई चयन प्रणाली को पूरी कानूनी मान्यता मिल जाएगी।
अदालत के पिछले फैसले और आगे का रास्ता
साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। उस फैसले में कहा गया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक प्रधानमंत्री, सीजेआई और विपक्ष के नेता की समिति चुनाव आयुक्तों का चयन करेगी।
इसके बाद सरकार नया कानून लेकर आई, जिसमें सीजेआई की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया गया। इसी बदलाव को लेकर पूरा विवाद खड़ा हुआ है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष अदालत इस नई याचिका पर क्या फैसला सुनाती है और क्या चयन प्रक्रिया में किसी नए सुधार के निर्देश दिए जाते हैं।










