नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — अमेरिका ने भारतीय आईटी सेक्टर की प्रमुख कंपनियों इंफोसिस और टीसीएस के खिलाफ कुछ नए और सख्त कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस ताजा घटनाक्रम ने भारतीय तकनीकी उद्योग की नींद उड़ा दी है। पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक नीतियों को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही थीं। अब सीधे तौर पर बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों को निशाना बनाए जाने से हालात थोड़े तनावपूर्ण हो गए हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने इस मामले की तह तक जाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों और बाजार के जानकारों से बात की है।
शुरुआती पड़ताल से पता चलता है कि यह पूरा मामला अमेरिकी वीजा नियमों, टैक्स नीतियों और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने की उनकी पुरानी रणनीति से जुड़ा है। अमेरिकी प्रशासन लगातार विदेशी कंपनियों पर वहां के स्थानीय इंजीनियरों को नौकरी देने का दबाव बना रहा है। टीसीएस और इंफोसिस जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां अमेरिका में बड़े पैमाने पर प्रोजेक्ट चलाती हैं। इन कंपनियों के लिए वहां के कड़े नियमों का पालन करना अब और ज्यादा खर्चीला साबित हो रहा है। इससे कंपनियों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
भारतीय आईटी सेक्टर पर अचानक क्यों बढ़ा दबाव?
अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके सहयोगियों द्वारा हाल के दिनों में कई बड़े आर्थिक फैसले लिए गए हैं। हाल ही में एक अन्य भारतीय कारोबारी समूह से जुड़े घटनाक्रम ने भी अमेरिकी बाजार का ध्यान खींचा था। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर 100 फीसदी तक के भारी-भरकम टैरिफ लगाने की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। इन सभी आर्थिक निर्णयों का असर सीधे तौर पर भारत के निर्यात और तकनीकी सेवाओं पर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि अमेरिका अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ये आक्रामक कदम उठा रहा है।
इन नए प्रशासनिक कदमों के बाद इंफोसिस और टीसीएस के प्रबंधकों ने अपने कानूनी सलाहकारों के साथ आपात बैठकें शुरू कर दी हैं। कंपनियों की यह कोशिश है कि वे अमेरिकी नियमों के दायरे में रहते हुए अपने काम को सुचारू रूप से चला सकें। हालांकि, वीजा शुल्क बढ़ने और नियमों के सख्त होने से भारतीय इंजीनियरों का अमेरिका जाना पहले से काफी मुश्किल हो गया है। कंपनियों को अब स्थानीय स्तर पर ही ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
शेयर बाजार और निवेशकों की प्रतिक्रिया
जैसे ही अमेरिका के इन नए कदमों की खबर भारतीय शेयर बाजार तक पहुंची, दोनों कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखा गया। निवेशकों में इस बात को लेकर डर है कि अगर अमेरिका ने नियमों को और ज्यादा कड़ा किया, तो भारतीय आईटी कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा घट जाएगा। अमेरिका से आने वाला राजस्व इन कंपनियों के कुल कारोबार का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। यही वजह है कि छोटी सी भी नीतिगत हलचल का असर दलाल स्ट्रीट पर तुरंत दिखाई दे जाता है।
दूसरी तरफ, भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी भी इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए इन व्यापारिक अड़चनों को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारत की ओर से हमेशा से यह पक्ष रखा गया है कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग से दोनों अर्थव्यवस्थाओं को फायदा होता है। लेकिन अमेरिकी राजनीतिक दबाव के चलते वहां की सरकार ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर हो रही है जो विदेशी कंपनियों के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं।
आगे की राह और कंपनियों की रणनीति
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि भारतीय आईटी कंपनियां इस अमेरिकी दबाव से निपटने के लिए क्या नया रास्ता निकालती हैं। क्या वे अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करके यूरोपीय और एशियाई बाजारों का रुख करेंगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब तलाशना हर निवेशक और कारोबारी के लिए जरूरी हो गया है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट में यह साफ हो गया है कि भारतीय तकनीकी उद्योग अब एक नए और कठिन दौर से गुजर रहा है।







