मैं जब भी वैश्विक संघर्षों के इतिहास को खंगालता हूं, तो 21 साल पहले शुरू हुई इराक की वह जंग जेहन में कौंध जाती है जिसने मध्य पूर्व के नक्शे को हमेशा के लिए बदल दिया। आज जब हम 'द फ्रीलान्स' के मंच से इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल की पड़ताल कर रहे हैं, तो आंकड़े खुद चीख-चीखकर उस तबाही की गवाही दे रहे हैं जो इस युद्ध के नाम पर दुनिया ने झेली। 4,500 से अधिक अमेरिकी जवानों की मौत और अरबों-खरबों डॉलर का भारी-भरकम खर्च—यह सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इंसानी त्रासदी की एक कभी न भरने वाली दास्तां है।
9/11 के बाद की वह आग और इराक का मोड़
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें 9/11 के उस विनाशकारी आतंकी हमले में जुड़ी हैं, जिसने अमेरिका की सुरक्षा नीति को झकझोर कर रख दिया था। अल-कायदा के उस हमले के बाद पैदा हुए वैश्विक सुरक्षा संकट का दायरा बढ़ाते हुए अमेरिका ने सद्दाम हुसैन के खात्मे के नाम पर इराक में सैन्य दखल दिया। इतिहास गवाह है कि कैसे एक आतंकवाद विरोधी अभियान धीरे-धीरे मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य दलदल में बदल गया, जिससे इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष जैसे क्षेत्रीय तनाव भी और अधिक जटिल होते चले गए।
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डोनाल्ड ट्रंप का रुख और बदलती अमेरिकी कूटनीति
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और डोनाल्ड ट्रंप के बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी जनता अब 'अनंतकाल तक चलने वाले युद्धों' (Endless Wars) से ऊब चुकी है। ट्रंप प्रशासन से लेकर वर्तमान राजनीतिक गलियारों तक, यह बहस तेज हो गई है कि विदेशों में अरबों डॉलर झोंकने के बजाय घरेलू मोर्चे पर ध्यान देना क्यों जरूरी है। इराक से सैनिकों की यह वापसी इसी बदलती हुई अमेरिकी कूटनीति और घरेलू राजनीतिक दबाव का परिणाम है, जो आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा।
मिट्टी पर खड़े सवाल: क्या सच में खत्म हुआ आतंकवाद?
एक फील्ड रिपोर्टर के रूप में जब हम जमीनी हकीकत टटोलते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या दो दशकों की इस भारी सैन्य मौजूदगी से इराक में वाकई शांति स्थापित हो पाई? सच तो यह है कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद भी इराक और आस-पास का क्षेत्र गहरे राजनीतिक और sectarian संकटों से जूझ रहा है। अल-कायदा के बाद आईएसआईएस जैसे संगठनों का उदय और सत्ता का संघर्ष इस बात का सबूत है कि सैन्य ताकत से वैचारिक और सामाजिक दरारों को भरा नहीं जा सकता।
भविष्य का भू-राजनीतिक असर
- मध्य पूर्व में शक्ति का नया संतुलन उभर रहा है, जहां क्षेत्रीय ताकतें अमेरिका की गैर-मौजूदगी में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।
- अमेरिकी रक्षा बजट और विदेश नीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसमें विदेशों में बड़े पैमाने पर सैनिकों की तैनाती से बचा जा रहा है।
- इराक की आंतरिक सुरक्षा पर अब स्थानीय बलों और मिलिशिया समूहों का प्रभाव बढ़ने की पूरी संभावना है।
अंततः, 21 साल बाद इराक से अमेरिकी सेना की विदाई इस बात का स्वीकारोक्ति है कि ताकत के बल पर हर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। यह इतिहास के एक बेहद महंगे और खूनी अध्याय का अंत तो है, लेकिन मध्य पूर्व के भविष्य के गर्भ में अभी कई और अनिश्चितताएं छिपी हुई हैं।








