बुंदेलखंड की सूखी धरती पर उम्मीद की नई बौछार
कभी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसने वाले बुंदेलखंड के बांदा जिले की तस्वीर अब धीरे-धीरे बदल रही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की महत्वाकांक्षी 'खेत तालाब योजना' यहां के किसानों के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं हो रही है। इस योजना के चलते अब बारिश का अमूल्य पानी यूं ही बेकार बहकर बर्बाद नहीं होता, बल्कि खेतों में ही बनाए गए तालाबों में सुरक्षित जमा हो जाता है। जरूरत पड़ने पर किसान इसी संचित जल का उपयोग अपनी फसलों की सिंचाई के लिए कर रहे हैं, जिससे उनकी खेतों की प्यास बुझ रही है और फसलों का उत्पादन भी बेहतर हो रहा है।
बांदा जिले के मटौंध और आसपास के ग्रामीण इलाकों में पिछले कुछ वर्षों तक खेती करना किसी बड़े जुए से कम नहीं था। यहां के किसान पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर रहते थे। यदि समय पर बारिश हो गई, तो थोड़ी बहुत फसल बच जाती थी, वरना किसानों की पूरी लागत डूब जाती थी। गेहूं, धान, सरसों, चना और अरहर जैसी प्रमुख फसलें पानी की कमी के कारण अक्सर सूख जाती थीं। ऐसी विकट परिस्थितियों में किसानों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो जाता था और कई परिवारों को मजबूरी में कर्ज के दलदल से बचने के लिए पलायन करना पड़ता था। लेकिन अब खेत तालाब योजना ने इस गहरी निराशा को उम्मीद और आत्मविश्वास में बदल दिया है।
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कैसे काम करती है खेत तालाब योजना और क्या है इसका मैकेनिज्म?
खेत तालाब योजना का मूल उद्देश्य जल संरक्षण और भूजल स्तर को ऊपर उठाना है। इस योजना के अंतर्गत किसानों के खेतों में या उनके करीब ही विशेष रूप से तालाबों का निर्माण कराया जाता है। जब बारिश होती है, तो खेतों से बहने वाला अतिरिक्त पानी इन तालाबों में आकर एकत्र हो जाता है। यह तकनीक न केवल बांदा जैसे सूखे इलाकों के लिए बल्कि पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए बेहद कारगर साबित हो रही है। संकट के समय जब आसमान से पानी नहीं बरसता, तब यही तालाब किसानों की फसलों को नया जीवनदान देते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां साल में कुछ महीनों में अच्छी बारिश होती है, लेकिन सही वाटर हार्वेस्टिंग न होने के कारण सारा पानी बहकर बर्बाद हो जाता था। खेत तालाब योजना ने इसी कमी को दूर किया है। अब पानी खेत का पानी खेत में ही रोकने की तर्ज पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा, सरकार इस योजना के तहत किसानों को आर्थिक सहायता भी प्रदान करती है, जिससे उन्हें अपने खेतों में तालाब खुदवाने में वित्तीय मदद मिलती है। इससे किसानों पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ता और वे कम लागत में बेहतर जल प्रबंधन करने में सक्षम हो रहे हैं।
सिंचाई के आधुनिक उपकरणों से मिल रहा है दोहरा लाभ
केवल तालाब खोदने तक ही इस योजना का दायरा सीमित नहीं है, बल्कि सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को और अधिक आधुनिक और पारदर्शी बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। कृषि विभाग की ओर से किसानों को पाइपलाइन, पंप सेट और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई प्रणाली) जैसी आधुनिक सुविधाओं पर भारी अनुदान यानी सब्सिडी प्रदान की जा रही है। पारंपरिक बाढ़ सिंचाई पद्धति में पानी की बहुत बर्बादी होती थी, लेकिन स्प्रिंकलर और पाइपलाइन के उपयोग से कम पानी में ही पूरे खेत की बेहतरीन सिंचाई हो जाती है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि पहले सिंचाई के साधन न होने के कारण उन्हें महंगे दामों पर डीजल या बिजली से चलने वाले पंप किराए पर लेने पड़ते थे, जिससे खेती की लागत बहुत बढ़ जाती थी। कई बार फसल की कटाई के समय बाजार में उचित दाम न मिलने के कारण किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ता था। लेकिन अब खेत में ही पानी का पक्का और निजी इंतजाम हो जाने से वे पूरी निश्चिंतता और आत्मविश्वास के साथ उन्नत और वैज्ञानिक तरीके से खेती कर पा रहे हैं।
"खेत तालाब योजना ने बांदा के किसानों को पूरी तरह आत्मनिर्भर बना दिया है। अब उन्हें बारिश के भरोसे नहीं बैठना पड़ता, बल्कि उनके पास सिंचाई के लिए अपना खुद का निजी जल स्रोत उपलब्ध है। इस साल हमने जिले में 255 नए किसानों को इस योजना से जोड़ने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए चयन और निर्माण का काम तेजी से चल रहा है।" — डॉ. अभय राज सिंह, उप कृषि निदेशक, बांदा
पलायन पर लगाम और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही मजबूती
बांदा जिले में इस योजना के सफल क्रियान्वयन का सबसे सकारात्मक प्रभाव यह देखने को मिला है कि ग्रामीण इलाकों से होने वाले पलायन में भारी कमी आई है। जो युवा और किसान कुछ साल पहले रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे, वे अब अपने ही खेतों में रहकर साल में दो से तीन फसलें उगा रहे हैं। इससे न केवल उनकी पारिवारिक आय में इजाफा हुआ है, बल्कि स्थानीय स्तर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नया संबल मिला है।
किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सब्जियों और बागवानी की तरफ भी रुख कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास अब सिंचाई के लिए बारहमासी पानी का विकल्प मौजूद है। सरकार के इन ठोस प्रयासों से बुंदेलखंड जो कभी पिछड़ेपन और सूखे का पर्याय माना जाता था, अब कृषि विकास के नए प्रतिमान गढ़ रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे इस योजना का दायरा और अधिक बढ़ेगा, बांदा और आसपास के जिलों की ग्रामीण तस्वीर और अधिक समृद्ध होने की पूरी उम्मीद है।







