रामनगरी अयोध्या में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी (SP) अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच चुनावी चुनौती ने 2027 की सियासी जंग का तापमान बढ़ा दिया है। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की हार ने उसके राजनीतिक दावों पर सवाल खड़े किए थे। अब दोनों नेताओं की बयानबाजी ने अयोध्या विधानसभा सीट को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सवाल है कि क्या BJP राम मंदिर और विकास के सहारे अपना दबदबा कायम रख पाएगी या सपा बदलते चुनावी समीकरणों के दम पर उसे चुनौती देगी?
अखिलेश की चुनौती और योगी का पलटवार
अयोध्या में ताजा सियासी घमासान की शुरुआत अखिलेश यादव की चुनौती से हुई। सपा अध्यक्ष 8 अक्टूबर को अयोध्या सीट से पार्टी के घोषित प्रत्याशी और पूर्व विधायक तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के पैतृक घर कृष्णापुर में आयोजित भागवत कथा में शामिल होने पहुंचे थे। यहां उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी। अखिलेश ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री को अपने काम पर भरोसा है तो उन्हें खुद चुनाव लड़कर देखना चाहिए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 अक्टूबर को बलरामपुर में पलटवार किया। उन्होंने अखिलेश को अयोध्या से चुनाव लड़ने का न्योता देते हुए कहा, "चलो एक बार किस्मत आज़मा लेते हैं। तय हो जाए। आप भी आइए, मैं भी आता हूं।" हालांकि, योगी ने स्पष्ट किया कि अयोध्या उनके लिए आस्था का स्थान है और उनके दौरों का उद्देश्य शहर का समग्र विकास सुनिश्चित करना है, न कि चुनाव लड़ना। योगी फिलहाल गोरखपुर शहरी सीट से विधायक हैं, जबकि अखिलेश यादव 2022 में करहल से विधायक चुने गए थे लेकिन 2024 में कन्नौज लोकसभा सीट जीतने के बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी थी।
चु चुनावी इतिहास और आंकड़े
अयोध्या विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास BJP के मजबूत आधार और बदलते वोट प्रतिशत, दोनों की कहानी कहता है। वर्ष 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन के चरम पर BJP के लल्लू सिंह को 51.3 प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2012 में सपा ने उलटफेर किया और पवन पांडेय ने BJP के लल्लू सिंह को हराया। वर्ष 2017 में BJP ने वापसी की और वेद प्रकाश गुप्ता जीते। 2022 में गुप्ता फिर जीते लेकिन BJP की जीत का अंतर घटकर 19,990 वोट रह गया, जबकि सपा का वोट शेयर बढ़कर 40.4 प्रतिशत पहुंच गया।
इन आंकड़ों में 2027 की लड़ाई के संकेत छिपे हैं। BJP ने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी पकड़ साबित की है लेकिन सपा ने भी अपना मताधार बढ़ाया है। अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा बताते हैं कि BJP के लिए चुनौती पुराने समर्थन को बनाए रखने की होगी जबकि सपा को बढ़े हुए वोट शेयर को जीत में बदलना होगा।
जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे
अयोध्या में जातीय समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। दलित मतदाताओं की बड़ी संख्या के साथ ब्राह्मण मतदाता भी अहम हैं। मुस्लिम और यादव समुदाय पारंपरिक रूप से सपा के समर्थक रहे हैं जबकि BJP को सवर्णों के साथ कुर्मी, निषाद, मौर्य और राजभर जैसे पिछड़े वर्गों से समर्थन मिलता रहा है। ब्राह्मण समुदाय से आने वाले पवन पांडेय को प्रत्याशी बनाकर सपा BJP के परंपरागत समर्थक वर्ग में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
जातीय गणित के साथ स्थानीय समस्याएं भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकती हैं। फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बावजूद, BJP अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4,667 वोटों से आगे रही। सपा ने बाकी चार क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। लोकसभा चुनाव में BJP की हार के बाद अधूरे ड्रेनेज कार्य, सड़कों और विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठे हैं, जिन्हें सपा अपने चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।
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