नदी के पानी में एक पल के लिए हलचल होती है। फिर सतह पर कुछ दिखाई देता है और अगले ही पल पानी शांत हो जाता है। रिवर डॉल्फिन यानी सूंस को देखना कई बार इतना ही मुश्किल होता है। अब सोचिए, ऐसी डॉल्फिन की गिनती करनी हो, जो नदी में रहती हैं और जिन्हें हर वक्त आंखों से देख पाना आसान नहीं। यही काम इन दिनों चंबल नदी में चल रहा है।
आधुनिक तकनीक और तीन राज्यों की संयुक्त टीम
राजस्थान के धौलपुर से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक फैली चंबल नदी में रिवर डॉल्फिन की नई गणना शुरू हो गई है। इस बार सर्वे में आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक तरीकों की मदद ली जा रही है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन विभागों के कर्मचारी इस काम में जुटे हैं। उनके साथ देहरादून के वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के 15 विशेषज्ञ भी हैं। सवाल सिर्फ ये नहीं कि चंबल में कितनी डॉल्फिन हैं, बल्कि यह भी है कि वे नदी के किन हिस्सों में मौजूद हैं और उनके संरक्षण के लिए आगे क्या किया जाना चाहिए।
मुख्य सर्वे शुरू होने से पहले वनकर्मियों को देवरी घड़ियाल केंद्र पर एक दिन की स्पेशल ट्रेनिंग दी गई। इसके बाद टीमें अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वे के लिए निकलीं। यह अभियान आगे बढ़ते हुए उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के अंतिम छोर इटावा के पचनदा तक पहुंचेगा, जहां आधुनिक उपकरणों की मदद से आंकड़े जुटाए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर चल रहा है जलीय जीवों का आकलन
चंबल में हो रही यह कवायद किसी एक नदी तक सीमित नहीं है। देश की प्रमुख नदियों में रिवर डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चल रहा है। पहला चरण 2021 से 2024 के बीच पूरा हुआ था, जिसमें देशभर में कुल 6,227 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। गणना का दूसरा फेज जनवरी 2026 से शुरू हुआ है, जिसके तहत अब चंबल और ब्रह्मपुत्र नदी में भी डॉल्फिन की गणना की जा रही है।
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