जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहने का दर्द क्या होता है, यह इस परिवार से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। कभी वेंटिलेटर की मशीनों की आवाज, कभी मॉनिटर पर आती धड़कनों की धीमी हलचल और हर पल अपने इकलौते बेटे को खोने का डर—एक मां ने लगातार दो साल तक अपने बेटे का सिरहाना नहीं छोड़ा। वहीं, पिता ने अपनी रोजी-रोटी का जरिया यानी टैक्सी चलाना छोड़ दिया और अस्पताल को ही अपना घर बना लिया। परिवार की बस एक ही उम्मीद थी कि उनका बेटा किसी दिन फिर से आंखें खोले और उन्हें देखकर मुस्कुरा सके।
हरियाणा के एक प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में डॉक्टरों की एक समर्पित टीम ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। करीब 23 महीने तक पूरी तरह से वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने के बाद अब यह 8 साल का बच्चा स्थिर हालत में अपने घर लौट चुका है। इस चमत्कारी रिकवरी ने न सिर्फ चिकित्सा जगत को हैरान कर दिया है, बल्कि इंसानियत और माता-पिता के संघर्ष की एक ऐसी मिसाल कायम की है जो सदियों तक याद रखी जाएगी।
अस्पताल पहुंचे तब हाथ-पैर भी नहीं हिला पा रहा था मासूम
इस संघर्ष की शुरुआत तब हुई जब बच्चे को बेहद गंभीर हालत में बाल चिकित्सा गहन चिकित्सा इकाई (PICU) में भर्ती कराया गया था। उस समय उसकी उम्र महज 6 साल थी। वह पूरी तरह से बेहोशी की हालत में था, उसे तेज बुखार था और उसके शरीर का कोई भी अंग, यहां तक कि हाथ-पायर भी काम नहीं कर रहे थे। हालत इतनी नाजुक थी कि हर गुजरते घंटे के साथ डॉक्टरों और परिवार की चिंता बढ़ती जा रही थी।
PICU के इंचार्ज और उनकी विशेषज्ञ मेडिकल टीम ने बिना एक पल गंवाए इलाज शुरू किया। लंबी और जटिल चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान बच्चे को लगातार फिजियोथेरेपी और विशेष पोषण सहायता (Nutritional Support) दी गई। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की दिन-रात की मेहनत के साथ-साथ उसके माता-पिता ने हर मुश्किल घड़ी में अटूट हौसला बनाए रखा।
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पिता ने छोड़ी नौकरी, मां ने दो साल तक अस्पताल को बनाया ठिकाना
बच्चे के पिता दिल्ली में टैक्सी चलाकर अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं और घर में इकलौते कमाने वाले हैं। बेटे की गंभीर बीमारी के आगे उनकी दुनिया थम गई। इलाज के भारी खर्च और बच्चे की देखभाल के लिए उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। दूसरी ओर, उनकी पत्नी पिछले दो साल से लगातार अस्पताल के एक कोने में अपने बेटे के बिस्तर के पास बैठी रहीं। एक तरफ बेटे को बचाने की जंग थी, तो दूसरी तरफ घर चलाने का गंभीर आर्थिक संकट। लेकिन दोनों ने कभी हार नहीं मानी।
इलाज कर रहे मुख्य डॉक्टर बताते हैं कि करीब दो साल की कड़ी मशक्कत के बाद अब बच्चे की सेहत में उल्लेखनीय सुधार आया है। वह अब अपने अंगों को हिला-डुला पा रहा है और सामान्य रूप से प्रतिक्रिया दे रहा है। डिस्चार्ज के दिन पूरा अस्पताल परिसर भावुक हो गया था। पिता ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के पैर छूकर आभार जताया, केक काटा और सभी का धन्यवाद किया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विभिन्न रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार इस खबर के दावों की सत्यता की 'The Freelance' पुष्टि करता है। यह घटना मानवीय संवेदनाओं और चिकित्सा जगत के अद्भुत सामंजस्य का प्रतीक है। साभार: मीडिया रिपोर्ट्स / संस्थान।








