भारत में चीता पुनर्स्थापना अभियान एक बेहद रोमांचक और ऐतिहासिक चरण में प्रवेश कर चुका है। कूनो नेशनल पार्क और गांधीसागर के बाद अब मध्य प्रदेश का एक और विशाल जंगल चीतों का नया आशियाना बनने जा रहा है। करीब एक सदी के लंबे अंतराल के बाद इस क्षेत्र के जंगलों में एक बार फिर चीतों की मौजूदगी दर्ज की जाएगी, जिसे वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।
एक सदी बाद ऐतिहासिक वापसी और विशेष तैयारियां
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे अंचल में करीब सौ साल पहले चीते प्राकृतिक रूप से पाए जाते थे, लेकिन समय के साथ वे विलुप्त हो गए। अब इस प्राकृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक तैयारियां की गई हैं। पहले चरण के तहत कूनो नेशनल पार्क से एक नर और एक मादा चीता को यहां लाया जा रहा है।
विशेषज्ञों की देखरेख के लिए यहाँ आधुनिक सुविधाओं से लैस विशेष बाड़े तैयार किए गए हैं। इनमें क्वारेंटीन और सॉफ्ट रिलीज बाड़े शामिल हैं, जिनकी सुरक्षा और संरक्षा के लिए उच्च तकनीकी इंतजाम किए गए हैं ताकि वन्यजीवों का सुगमता से नए माहौल में अनुकूलन हो सके।
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बाघ और तेंदुओं के साथ सह-अस्तित्व की चुनौती
इस नई पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चीतों को एक ऐसे प्राकृतिक तंत्र में छोड़ा जा रहा है जहाँ पहले से ही बाघ और तेंदुए बहुतायत में मौजूद हैं। खुले जंगल में इन शिकारी जीवों का आमना-सामना होना तय है। वन्यजीव विशेषज्ञ इस बात पर बारीक नजर बनाए हुए हैं कि चीते नए वातावरण और अन्य मांसाहारी जीवों के बीच खुद को कैसे ढालते हैं।
पर्यटन और रोजगार को मिलेगा नया आयाम
प्रदेश के इस सबसे बड़े टाइगर रिजर्व में चीतों के आने से स्थानीय स्तर पर वन्यजीव पर्यटन को भारी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के कारण होटल, होम-स्टे, गाइड और स्थानीय कारोबार से जुड़े लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
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