दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरे अनिवार्य रूप से लागू करने का सीधा आदेश देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने इस मामले में फैसला सरकार पर छोड़ते हुए जनहित याचिका को सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व के तौर पर मानने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही सरकार को इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर छह महीने के भीतर अपना फैसला लेने को कहा गया है।
यह जनहित याचिका विशेष रूप से उन पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों के लिए बॉडी कैमरा जरूरी करने की मांग को लेकर दायर की गई थी, जिन्हें भीड़ नियंत्रण, प्रदर्शनों को संभालने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौतीपूर्ण ड्यूटी पर तैनात किया जाता है। याचिका में यह दलील दी गई थी कि आधुनिक तकनीक के इस दौर में ऐसे उपकरणों के इस्तेमाल से पुलिस कार्रवाई में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही दोनों में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
ड्यूटी के दौरान लगातार कैमरा चालू रखने की थी मांग
याचिकाकर्ता के कानूनी प्रतिनिधियों ने कोर्ट के समक्ष यह पक्ष रखा था कि सुरक्षा बलों के लिए एक स्पष्ट और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जानी चाहिए। इसके तहत ड्यूटी पर तैनाती के शुरुआती क्षण से लेकर कार्य समाप्ति तक बॉडी कैमरा लगातार चालू रहने का प्रावधान होना चाहिए ताकि किसी भी विवाद की स्थिति में वास्तविक तथ्यों की पड़ताल आसानी से की जा सके।
हालांकि, अदालत ने फिलहाल इसे कानूनी तौर पर अनिवार्य बनाने से परहेज किया, लेकिन सरकार को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने का निर्देश जरूर दिया। दूसरी ओर, अदालती प्रक्रिया के बीच ही दिल्ली पुलिस ने एहतियातन नई दिल्ली क्षेत्र में फ्रंटलाइन ड्यूटी पर तैनात अपने कर्मियों को बॉडी-वॉर्न कैमरे मुहैया कराने शुरू कर दिए हैं। हालिया प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के दौरान इन कैमरों का जमीनी स्तर पर उपयोग भी देखा गया है।
जांच और पारदर्शिता में मिलेगी मदद
पुलिस सूत्रों के अनुसार, इन कैमरों के जरिए मौके पर होने वाली घटनाओं, पुलिसर्किमयों और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत का पुख्ता डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो जाता है। यदि भविष्य में किसी प्रकार की शिकायत सामने आती है, तो यह फुटेज आंतरिक जांच और अदालती कार्रवाइयों में एक अहम सबूत के रूप में साबित हो सकती है। इससे यह स्पष्ट करने में आसानी होगी कि मौके पर वास्तव में क्या परिस्थितियां बनी थीं।
गौरतलब है कि सुरक्षा बलों की कार्यप्रणाली और बॉडी कैमरों की अनिवार्यता का यह मुद्दा ऐसे समय में गर्माया है जब राष्ट्रीय राजधानी में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रदर्शनों का दौर जारी है। हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के बाद कुछ महिला पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिस के रवैये को लेकर गंभीर शिकायतें दर्ज कराई गई थीं, जिसके बाद इस तकनीक के इस्तेमाल की मांग और अधिक मुखर हो गई थी।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित इस खबर के दावों की सत्यता की 'The Freelance' स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है। यह मामला न्यायपालिका और प्रशासनिक नीतियों से जुड़ा हुआ व्यापक चर्चा का विषय है।








