उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से तीन महीने के भीतर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संपन्न कराने का निर्देश दिए जाने के बाद, अब राष्ट्रीय पंचायत राज ग्राम प्रधान संगठन ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला किया है। संगठन का दावा है कि जमीनी हकीकत और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा किए बिना तय समयसीमा में चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
ओबीसी आरक्षण और मतदाता सूची की विसंगतियां बनी मुख्य वजह
राष्ट्रीय पंचायत राज ग्राम प्रधान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अखिलेश सिंह ने स्पष्ट किया है कि संगठन हाईकोर्ट के इस आदेश को सर्वोच्च अदालत में चुनौती देगा। उनके मुताबिक, पंचायत चुनाव कराने से पहले कई महत्वपूर्ण और अनिवार्य प्रक्रियाएं पूरी होनी बाकी हैं। इनमें सबसे अहम मुद्दा पिछड़ा वर्ग आरक्षण का अधूरा आकलन है। संगठन का आरोप है कि राज्य सरकार द्वारा गठित पिछड़ा वर्ग आयोग अभी तक सभी जिलों का दौरा पूरा नहीं कर पाया है और केवल सीमित जिलों में ही आकलन हुआ है।
इसके अलावा, मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों और विसंगतियों का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया है। संगठन का दावा है कि राज्य निर्वाचन आयोग और भारत निर्वाचन आयोग की मतदाता सूचियों में लगभग 3 करोड़ 94 लाख मतदाताओं का बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। उदाहरण के तौर पर लखनऊ की एक ग्राम पंचायत की सूची में नगर निगम की पार्षद और कार्यकारिणी सदस्य का नाम शामिल होने का मामला उठाया गया है, जिससे सूची की शुचिता पर सवाल खड़े होते हैं।
जनगणना, बोर्ड परीक्षाएं और अन्य चुनाव भी बड़ी चुनौती
डॉ. अखिलेश सिंह ने पंचायत चुनाव में देरी की आशंका जताते हुए कहा कि आने वाले दिनों में जनगणना, बोर्ड परीक्षाएं और मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी बड़ी प्रशासनिक गतिविधियां होनी हैं। साथ ही आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियां भी वक्त पर शुरू होनी हैं। ऐसे में सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के लिए मात्र तीन महीने के भीतर पूरी पारदर्शिता के साथ पंचायत चुनाव संपन्न कराना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। संगठन का अनुमान है कि तमाम कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों के चलते राज्य में पंचायत चुनाव अप्रैल से पहले होना मुश्किल है।
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