राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिला पत्रकारों के साथ पुलिस की कथित बदसलूकी और मारपीट के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद गंभीरता दिखाई है। अदालत ने संकेत दिया है कि इन आरोपों की सुनवाई और जांच के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की जा सकती है। इस मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह से जरूरी दस्तावेज और नाम दो सीलबंद लिफाफों में पेश करने को कहा है।
कमेटी गठन और सीलबंद लिफाफों में मांगे गए नाम
एक लिफाफे में उन महिला पत्रकारों के नाम होंगे, जिनके साथ कथित तौर पर मारपीट या दुर्व्यवहार हुआ है। वहीं, दूसरे लिफाफे में रिटायर्ड महिला जजों और पुलिस अधिकारियों के नाम देने को कहा गया है, जिन्हें इस प्रस्तावित जांच कमेटी में शामिल किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि निष्पक्ष जांच के लिए यह कदम बेहद जरूरी है। कमेटी के गठन और उसके दायरे को लेकर अंतिम फैसला अदालत की ओर से लिया जाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार मामले में कड़ा रुख अपनाया है। #SupremeCourt #DelhiPolice
— The Freelance (@TheFreelanceIN) September 18, 2024
गिरफ्तारी पर रोक और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने एक महिला पत्रकार को सुरक्षा देने की जोरदार मांग उठाई। उनके मुताबिक, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उस पत्रकार के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST Act के तहत FIR दर्ज कराई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए चीफ जस्टिस ने दिल्ली पुलिस को स्पष्ट निर्देश दिया कि उस महिला पत्रकार को गिरफ्तार न किया जाए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि अगर महिला पत्रकार जांच में शामिल होती है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही, मामले से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं ताकि घटनास्थल पर हुई वास्तविक गतिविधियों और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष पड़ताल की जा सके।
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