राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई अब कागजी विज्ञापनों से निकलकर सीधे फ्यूल स्टेशनों और प्रशासनिक गलियारों तक पहुंच चुकी है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम ने आज सुबह से ही दिल्ली के कई पेट्रोल पंपों का दौरा किया और पाया कि शासन की सख्ती का असर अब साफ जमीन पर दिखने लगा है। आज से दिल्ली में 'नो पीयूसीसी, नो फ्यूल' (बिना पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट के पेट्रोल-डीजल नहीं) का नियम पूरी कड़ाई से लागू कर दिया गया है, जिसके चलते राजधानी के विभिन्न केंद्रों पर वाहन चालकों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
पेट्रोल पंपों पर बढ़ी चौकसी, पीयूसीसी की मांग में 50% का उछाल
पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली के कई ईंधन स्टेशनों पर हमारे रिपोर्टर ने पाया कि सुरक्षाकर्मियों और पंप कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बिना वैध पीयूसीसी के किसी भी वाहन (कार या दोपहिया) को ईंधन न दिया जाए। इस अचानक सख्ती के बाद पिछले 24 घंटों में पीयूसीसी टेस्टिंग सेंटर्स पर सर्टिफिकेट बनवाने वालों की संख्या में 50 प्रतिशत से अधिक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि, कई वाहन चालकों ने इस अचानक हुए बदलाव पर नाराजगी भी जताई, लेकिन बढ़ते वायु प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन अपनी इस नीति पर पूरी तरह अडिग नजर आ रहा है।
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सीपीसीबी का बड़ा कदम: भारी कचरा पैदा करने वालों का पंजीकरण अनिवार्य
केवल vehicular pollution ही नहीं, बल्कि सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर भी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने एक बेहद कड़ा और बड़ा फैसला लिया है। नए नियमों के तहत अब ज्यादा कचरा पैदा करने वाले संस्थानों, कमर्शियल यूनिट्स और रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्सों के लिए आधिकारिक पोर्टल पर पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है। इस प्रक्रिया के तहत श्रेणी के अनुसार 1,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक का शुल्क तय किया गया है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि इस नियम को सही तरीके से जमीन पर उतारा गया, तो दिल्ली-एनसीआर के लैंडफिल साइट्स पर बढ़ता बोझ कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
'मैं भी यमुना प्रहरी' ऐप: युवाओं को जोड़ने की अनूठी पहल
यमुना नदी की दयनीय स्थिति से हर कोई वाकिफ है, लेकिन अब इसके पुनरुद्धार के लिए जमीनी स्तर पर युवाओं को शामिल करने की योजना बनाई गई है। राजधानी के करीब 30 कॉलेजों के हजारों विद्यार्थी 'मैं भी यमुना प्रहरी' मोबाइल ऐप के जरिए इस अभियान से जुड़ेंगे और नदी की स्वच्छता का संकल्प लेंगे। रिपोर्टिंग के दौरान यह बात सामने आई कि प्रशासन अब जनता की सीधी भागीदारी (Community Policing & Participation) के बिना पर्यावरण संरक्षण असंभव मान रहा है।
न्यायिक और प्रशासनिक मोर्चे पर अन्य बड़े घटनाक्रम
राजधानी से जुड़े नीतिगत और प्रशासनिक बदलावों की कड़ी में दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi HC) का एक महत्वपूर्ण फैसला भी सामने आया है। अदालत ने एमसीडी (MCD) की प्राइमरी शिक्षक भर्ती परीक्षा में 30 वर्ष की आयु सीमा में 10 साल की छूट देने की मांग को खारिज कर दिया है। अदालत के इस रुख से स्पष्ट है कि निर्धारित प्रशासनिक नियमों और योग्यताओं के मामलों में फिलहाल कोई ढील मिलने वाली नहीं है।
निष्कर्ष और भविष्य का असर
आज के ये तमाम घटनाक्रम संकेत देते हैं कि दिल्ली में अब पर्यावरण, शिक्षा और नागरिक अनुशासन के मामलों में प्रशासन 'जीरो टॉलरेंस' की नीति पर काम कर रहा है। पेट्रोल पंपों पर पीयूसीसी की अनिवार्यता तात्कालिक रूप से भले ही आम जनता के लिए थोड़ी असुविधाजनक लगे, लेकिन लंबी अवधि में यह राजधानी की जहरीली हवा को साफ करने की दिशा में एक बेहद जरूरी और कड़ा कदम साबित हो सकता है।








