बरसात का मौसम और उसके तुरंत बाद का समय अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां लेकर आता है। इस दौरान मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां जैसे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया विकराल रूप धारण कर लेती हैं। देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर से लेकर देश के तमाम राज्यों में हर साल इस मौसम में स्वास्थ्य विभाग की तरफ से विशेष अलर्ट जारी किए जाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि जरा सी लापरवाही मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, इसलिए डेंगू के पूरे चक्र को समझना और इसके हर चरण पर पैनी नजर रखना बेहद जरूरी है।
आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि डेंगू का मतलब सिर्फ प्लेटलेट्स का तेजी से कम होना है। हालांकि, यह इस बीमारी का सिर्फ एक पहलू है। चिकित्सा जगत में इस बात पर जोर दिया जाता है कि डेंगू वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद किस तरह से असर दिखाता है, इसकी पूरी प्रक्रिया को समझना हर आम नागरिक के लिए फायदेमंद है। शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, बदन दर्द, आंखों के पीछे दर्द और जोड़ों में जकड़न शामिल होती है, जिसके बाद रक्त जांच के जरिए स्थिति का आकलन शुरू होता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी: तीसरे से सातवें दिन के बीच होता है सबसे बड़ा खतरा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों और मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक, डेंगू के मरीजों की हालत में सबसे गंभीर बदलाव बीमारी शुरू होने के करीब तीन से सात दिन के बीच आते हैं। इस समयावधि को चिकित्सा विज्ञान की भाषा में 'क्रिटिकल फेज' यानी अत्यंत संवेदनशील दौर कहा जाता है। इस दौरान शरीर के भीतर रक्त वाहिकाओं से प्लाज्मा का रिसाव होने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे ब्लड प्रेशर में अचानक गिरावट आ सकती है और मरीज शॉक की स्थिति में जा सकता है।
यही वह समय होता है जब मरीज और उसके परिजनों को अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। अस्पताल में भर्ती मरीजों की इस दौरान हर घंटे पल्स रेट, ब्लड प्रेशर और यूरिन आउटपुट की मॉनिटरिंग की जाती है ताकि किसी भी आपात स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। डॉक्टरों का यह भी मानना है कि इस चरण में प्लेटलेट्स की संख्या तेजी से नीचे गिरती है, जिससे ब्लीडिंग का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
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बुखार उतरने को न समझें खतरे का टलना, यहीं से शुरू होती है असली परीक्षा
एक आम धारणा यह है कि जब मरीज का बुखार उतर जाता है, तो इसका मतलब यह होता है कि वह ठीक हो रहा है और अब खतरे की कोई बात नहीं है। लेकिन डेंगू के मामले में यह धारणा बिल्कुल गलत साबित होती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, डेंगू का 'क्रिटिकल फेज' अक्सर उसी समय शुरू होता है या उसके आसपास आता है जब मरीज का बुखार कम होने लगता है।
बुखार कम होने पर मरीज और उसके परिजन राहत की सांस लेते हैं और कई बार अस्पताल से डिस्चार्ज की जिद करने लगते हैं या घर पर ही लापरवाही बरतने लगते हैं। जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत होती है। बुखार उतरने के बाद के 48 घंटे मरीज के स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे ज्यादा निर्णायक होते हैं। इस दौरान आंतरिक अंगों पर दबाव बढ़ सकता है और अचानक से प्लेटलेट्स क्रिटिकल स्तर तक नीचे लुढ़क सकती हैं।
"डेंगू के इलाज में सबसे बड़ी भूल यह मान लेना है कि बुखार उतरने का मतलब मरीज स्वस्थ हो गया है। असली संकट और सतर्क रहने का वक्त बुखार कम होने के बाद शुरू होता है, जब शरीर का प्लाज्मा लीक होने और प्लेटलेट्स गिरने का खतरा अपने चरम पर होता है।" — डॉ. आर. के. शर्मा, वरिष्ठ फिजीशियन एवं महामारी विशेषज्ञ
प्लेटलेट्स गिरने की पूरी प्रक्रिया और शरीर पर उसका घातक असर
हमारे खून में प्लेटलेट्स वे छोटी कोशिकाएं होती हैं जो रक्त का थक्का जमाने में मदद करती हैं ताकि चोट लगने पर खून का बहना रुक सके। डेंगू वायरस हमारे बोन मैरो पर असर डालता है, जिससे नई प्लेटलेट्स का बनना कुछ समय के लिए धीमा हो जाता है। इसके अलावा, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता की प्रतिक्रिया के कारण भी प्लेटलेट्स तेजी से नष्ट होने लगती हैं।
जब प्लेटलेट्स की संख्या एक लाख से नीचे आने लगती है, तो डॉक्टरों की निगरानी बढ़ जाती है। हालांकि, असली खतरा तब पैदा होता है जब यह संख्या बीस से तीस हजार के आसपास पहुंच जाती है या उससे नीचे गिर जाती है। इस स्थिति में शरीर के किसी भी हिस्से से आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव का खतरा पैदा हो जाता है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा बन सकता है।
डॉक्टरों की सलाह: क्या करें और किन बातों से बचें
चिकित्सकों का स्पष्ट निर्देश है कि डेंगू के लक्षण दिखते ही खुद से दवाइयां लेने से बचना चाहिए। विशेष तौर पर एस्प्रिन या आइबूप्रोफेन जैसी पेनकिलर दवाइयां डेंगू के मरीज के लिए जहर के समान होती हैं क्योंकि ये खून को पतला करती हैं और ब्लीडिंग का खतरा बढ़ा देती हैं। बुखार होने पर केवल पैरासिटामोल का ही इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर किया जाना चाहिए।
मरीज को हाइड्रेटेड रखना सबसे जरूरी कदम है। नारियल पानी, ओआरएस का घोल, फ्रेस जूस और पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर में पानी की कमी नहीं होती और प्लेटलेट्स गिरने के असर को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत हर मरीज को पड़े यह जरूरी नहीं है। यह पूरी तरह से मरीज की क्लिनिकल कंडीशन और ब्लीडिंग के लक्षणों पर निर्भर करता है।
निष्कर्ष: सावधानी और सही जानकारी ही बचा सकती है जान
डेंगू कोई लाइलाज बीमारी नहीं है, बशर्ते समय पर इसकी पहचान हो जाए और सही दिशा में इलाज मिले। बुखार उतरने के बाद भी कमजोरी, चक्कर आना, पेट में तेज दर्द, लगातार उल्टी आना या शरीर पर लाल चकत्ते उभरना जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल का रुख करना चाहिए। मच्छरों से बचाव के लिए घर के आसपास पानी जमा न होने दें, पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी का इस्तेमाल करें। सतर्कता और जागरूकता ही इस खतरनाक बीमारी से बचने का सबसे बड़ा हथियार है।










