बेंगलुरु और दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों केंद्रीय भारी उद्योग और इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की आक्रामक मुद्रा ने कर्नाटक की सियासत का पारा चढ़ा दिया है। द फ्रीलान्स की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, कुमारस्वामी ने एक तरफ जहां राज्य सरकार के मंत्रियों और फैसलों पर तीखे सवाल उठाए हैं, वहीं दूसरी तरफ वह नीतिगत और प्रशासनिक मोर्चों पर भी लगातार आक्रामक बने हुए हैं। हाल ही में ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में उन्होंने Tata Harrier.ev और Kia Carens Clavis EV जैसी इलेक्ट्रिक गाड़ियों का टेस्ट ड्राइव भी लिया, जो उनके तकनीकी और औद्योगिक रुझान को दर्शाता है, लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर उनकी तलवारें पूरी तरह खिंची हुई हैं।
NICE प्रोजेक्ट और किसानों के मुआवजे का मुद्दा
कर्नाटक की राजनीति का सबसे बड़ा सुलगता मुद्दा एक बार फिर 'नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर एंटरप्राइज' (NICE) प्रोजेक्ट बन गया है। केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने राज्य सरकार और विशेषकर उप मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि वे बेनामी फर्मों के जरिए इस प्रोजेक्ट को हथियाने की फिराक में हैं। कुमारस्वामी ने कड़े शब्दों में मांग की है कि NICE द्वारा की जा रही अनधिकृत टोल वसूली को तुरंत रोका जाए और BMICP (बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट) को अपने हाथ में लिया जाए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जिन किसानों ने इस प्रोजेक्ट के लिए अपनी उपजाऊ जमीनें गंवाई हैं, उन्हें आज तक उचित मुआवजा नहीं मिला है। 'द फ्रीलान्स' के रिपोर्टर्स से बात करते हुए स्थानीय किसानों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि मुआवजे का संकट दशकों से अनसुलझा है।
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'मूर्खता और गैर-जिम्मेदारी की हद': KPSC विवाद पर जुबानी जंग
विवाद केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक नियुक्तियों और संवैधानिक संस्थाओं तक पहुंच चुका है। कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) से जुड़े एक हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए एच.डी. कुमारस्वामी ने डी.के. शिवकुमार के बयान को 'मूर्खता और गैर-जिम्मेदारी की पराकाष्ठा' करार दिया है। कुमारस्वामी का कहना है कि राज्य में सत्ता में बैठे लोग अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं और पारदर्शी प्रक्रियाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं। इस बयानबाजी के बाद जेडीएस (JDS) और कांग्रेस के बीच वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष और अधिक तीव्र हो गया है।
सबूतों के साथ खुलासे की चेतावनी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुमारस्वामी जिस प्रकार आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं, उससे आने वाले दिनों में राज्य की सियासत में और भूकम्प आ सकता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि उनके पास डी.के. शिवकुमार और NICE प्रोजेक्ट से जुड़े भ्रष्टाचार के पुख्ता दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं। एक वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के तौर पर हमारी पड़ताल दर्शाती है कि आने वाले हफ्तों में ये दस्तावेज राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा धमाका कर सकते हैं। किसान संगठनों ने भी कुमारस्वामी के इस रुख का समर्थन किया है, जिससे सत्ताधारी दल पर दबाव काफी बढ़ गया है।
भविष्य का राजनीतिक असर और निष्कर्ष
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब कर्नाटक सरकार अपने कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स और प्रशासनिक फैसलों को लेकर पहले से ही विपक्ष के निशाने पर है। एक तरफ जहां केंद्र और राज्य के बीच का टकराव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता और जमीन गंवाने वाले किसान न्याय की आस लगाए बैठे हैं। एच.डी. कुमारस्वामी द्वारा उठाए गए ये कदम न केवल उनकी पार्टी के जनाधार को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हैं, बल्कि यह राज्य की राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी बहस को भी जन्म दे रहे हैं। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे प्रकरण पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और आगे के खुलासों को पाठकों के सामने लाता रहेगा।




