लश्कर कमांडर हाशिम मूसा के खात्मे के बाद खुले कई चौंकाने वाले राज
जम्मू-कश्मीर की वादियों में आतंक का पर्याय बन चुके प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा का अध्याय समाप्त हो चुका है। मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के यूसमर्ग इलाके में सुरक्षा बलों के साथ हुई एक मुठभेड़ में उसे ढेर कर दिया गया था। इस सफल सैन्य कार्रवाई के बाद अब जांच एजेंसियों के हाथ जो जानकारियां लगी हैं, वे बेहद हैरान करने वाली हैं। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि यह खूंखार आतंकवादी पाकिस्तानी सेना के विशेष बल (एसएसजी) का पूर्व कमांडो रह चुका था और घाटी में बड़े हमलों की साजिश रचने में माहिर था।
सुरक्षा बलों और खुफिया तंत्र के लिए यह ऑपरेशन एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, क्योंकि मूसा पिछले लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था। वह साल 2025 में हुए भीषण पहलगाम आतंकी हमले के मुख्य योजनाकारों में शामिल था। उसके मारे जाने के बाद जब उसके छिपने के ठिकानों और सहयोगियों की पड़ताल की गई, तो उसकी जीवनशैली और जंगलों में बिताए गए दिनों के कई राज खुलकर सामने आए। सुरक्षा अधिकारी अब इस बात की तह तक जाने की कोशिश कर रहे हैं कि उसे जमीनी स्तर पर कौन लोग रसद और पनाह मुहैया करा रहे थे।
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घने जंगलों में छिपे रहने के दौरान अपनाता था अजीबोगरीब नुस्खा
भारतीय सेना के कड़े पहरे और लगातार चलाए जा रहे तलाशी अभियानों के कारण आतंकियों के लिए मैदानी इलाकों में टिकना नामुमकिन हो गया था। ऐसे में हाशिम मूसा और उसका साथी यासिर पुंछ और राजौरी के घने जंगलों में छिपे हुए थे। राजौरी के डोरीमल-गंभीर मुगला इलाके में चलाए गए 'ऑपरेशन शेरुवाली' के दौरान सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में मूसा को गोली लग गई थी। यह सैन्य अभियान 45 दिनों से भी अधिक समय तक चला था, जिसमें दोनों तरफ से भारी गोलीबारी हुई थी।
जंगल के भीतर चिकित्सीय सहायता या डॉक्टर उपलब्ध न होने के कारण मूसा के लिए गंभीर रूप से घायल जख्मों का इलाज कराना एक बड़ी चुनौती बन गया था। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, सेना की घेराबंदी के बीच अस्पताल तक पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में संक्रमण से बचने और घावों को तेजी से ठीक करने के लिए उसने पारंपरिक और घरेलू तरीकों का सहारा लिया। वह अपने शरीर पर लगे गोली के जख्मों पर शुद्ध शहद का लेप लगाता था, ताकि टिशू रिकवरी तेज हो सके और जख्मों में मवाद न पड़े।
पाकिस्तानी हैंडलर्स को भेजी जाती थी जख्मों और इलाज की तस्वीरें
खुफिया सूत्रों के हवाले से यह भी खुलासा हुआ है कि हाशिम मूसा अपने पाकिस्तानी आकाओं के साथ लगातार संपर्क में था। सितंबर के महीने में ही सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए एक अन्य आतंकी यासिर के मोबाइल फोन की जब फॉरेंसिक जांच की गई, तो उसमें मूसा के घावों और शहद से किए जा रहे इलाज की कई तस्वीरें मिलीं। न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ये तस्वीरें सीमा पार बैठे पाकिस्तानी हैंडलर्स को भेजी जाती थीं, ताकि उन्हें मूसा की सेहत और शारीरिक स्थिति की नियमित जानकारी मिलती रहे।
"आतंकी संगठनों से जुड़े ऐसे मामलों में सीमा पार बैठे आकाओं को अपने कमांडरों की पल-पल की खबर चाहिए होती है। जख्मों की तस्वीरें भेजने का मकसद यह जताना था कि उनका मुख्य कमांडर अभी जीवित है और लड़ाई जारी रखने में सक्षम है।" — वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी, जम्मू-कश्मीर
इन तस्वीरों से साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तानी एजेंसियां घाटी में सक्रिय अपने आतंकवादियों की हर गतिविधि पर बारीक नजर रखती थीं और उन्हें निर्देश देती थीं। हालांकि, तमाम नुस्खों और पाकिस्तानी मदद के बावजूद भारतीय सुरक्षा बलों के अचूक निशाने से यह आतंकवादी बच नहीं सका और अंततः उसे अपने अंजाम तक पहुंचना ही पड़ा।
मुठभेड़ स्थल के पास मिला संदिग्ध बैग और लॉजिस्टिक नेटवर्क की पड़ताल
बडगाम जिले के पालमेदन और दूधपथरी इलाकों में 29 सितंबर को हुई मुठभेड़ के बाद पुलिस ने घटनास्थल के आसपास गहन तलाशी अभियान चलाया था। इस दौरान पुलिस को एक संदिग्ध बैग बरामद हुआ, जिसके भीतर भारी मात्रा में दवाइयां और खाने-पीने का सामान रखा हुआ था। पुलिस इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि यह सामान आखिर वहां तक कौन पहुंचाकर गया था और इसके पीछे स्थानीय स्तर पर कौन-कौन से ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) सक्रिय थे।
खानसाहिब थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 181/2026 के तहत इस पूरे लॉजिस्टिक नेटवर्क की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं। जांच एजेंसियां उन तमाम संदिग्ध चेहरों की पहचान करने में जुटी हैं जो जंगलों में छिपे इन आतंकवादियों को राशन, दवा और अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया करा रहे थे। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकियों के खात्मे के साथ-साथ उनके मददगारों के नेटवर्क को नेस्तनाबूद करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की वारदातों को पूरी तरह रोका जा सके।








