देशभर में डिजिटल लेन-देन का मुख्य जरिया बन चुके यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई को लेकर एक बार फिर बड़ी कानूनी और आर्थिक बहस छिड़ गई है। पिछले कुछ वर्षों से पूरी तरह मुफ्त और आम आदमी की पहुंच में रहे डिजिटल भुगतानों के ढांचे में बदलाव की सुगबुगाहट ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई तय की गई है, जो सीधे तौर पर दो हजार रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लगाए गए मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर से जुड़ी हुई है। इस याचिका के जरिए केंद्र सरकार के उस फैसले की वैधता को चुनौती दी गई है जिसके तहत चुनिंदा व्यावसायिक भुगतानों पर शुल्क का प्रावधान किया गया है।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब देश के करोड़ों नागरिक रोजाना अपनी छोटी-बड़ी खरीदारी के लिए यूपीआई का बेधड़क इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के इस कदम और इस पूरे मामले के कानूनी तथा आर्थिक पहलुओं पर देश भर की निगाहें टिकी हुई हैं। अदालत में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि न्यायिक समीक्षा के दौरान डिजिटल भुगतान के भविष्य को लेकर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या इससे आम जनता को भविष्य में किसी प्रकार की राहत मिलने की उम्मीद जगती है या नहीं।
याचिका में क्या है मुख्य आरोप और कानूनी सवाल
यह जनहित याचिका अधिवक्ता रंजन दत्ता द्वारा दायर की गई है, जिसमें 14 सितंबर की अधिसूचना और उसके बाद आए एमडीआर ढांचे को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया गया है। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क है कि इतने बड़े और दूरगामी आर्थिक प्रभाव वाले नियमों को बिना किसी पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता या व्यापक सार्वजनिक परामर्श के जल्दबाजी में लागू कर दिया गया है। याचिका में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की संशोधित धारा 10ए की संवैधानिकता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि बिना किसी विधिवत प्रकाशित वैधानिक दस्तावेज के केवल प्रेस विज्ञप्ति या अक्सर पूछे जाने वाले सवालों यानी एफएक्यू के आधार पर शुल्क थोपना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। इसके अलावा, यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के बीच किए गए अंतर पर भी सवाल खड़े किए गए हैं, क्योंकि रुपे कार्ड पर बिना किसी मौद्रिक सीमा के मुफ्त सुविधा लगातार जारी रखी गई है। याचिकाकर्ता का मानना है कि इस तरह के नियमों से डिजिटल भुगतान की संस्कृति पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
संबंधित खबरें
सरकार का पक्ष: ग्राहकों की जेब पर नहीं पड़ेगा कोई असर
दूसरी तरफ, सरकार और संबंधित आधिकारिक सूत्रों ने इन तमाम आशंकाओं और विरोध के स्वरों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि दो हजार रुपये से अधिक के यूपीआई पेमेंट पर लगने वाला 0.4% शुल्क यानी एमडीआर सीधे तौर पर ग्राहकों से वसूल नहीं किया जाएगा। सरकार के सूत्रों के मुताबिक, एमडीआर का एक भी पैसा देश के सरकारी खजाने में नहीं जाएगा, बल्कि यह पूरी रकम यूपीआई सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने वाली संस्थाओं और बैंकों में बांटी जाएगी।
विपक्षी दलों की ओर से इसे टैक्स बताए जाने के दावों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह न तो कोई टैक्स है, न ही सेस और न ही किसी प्रकार का सरचार्ज। यह विशुद्ध रूप से मर्चेंट और पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़े तकनीकी मध्यस्थों के बीच का वित्तीय समायोजन है। सरकार का यह भी कहना है कि आम नागरिकों के बीच होने वाले सामान्य यानी पर्सन-टू-पर्सन लेनदेन पहले की तरह पूरी तरह सुरक्षित और मुफ्त बने रहेंगे।
एमडीआर की राशि का किस तरह होगा बंटवारा
वित्तीय विशेषज्ञों और आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, एमडीआर के तहत जो भी शुल्क वसूला जाएगा, उसे एक निश्चित फॉर्मूले के तहत चार अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया जाएगा। इस व्यवस्था के तहत कुल एमडीआर का 40 प्रतिशत हिस्सा सीधे ग्राहक के बैंक को मिलेगा, जिससे बैंकिंग सेवाओं को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, 30 प्रतिशत राशि पेमेंट गेटवे को, 20 प्रतिशत राशि यूपीआई ऐप को और शेष 10 प्रतिशत राशि यूपीआई ऐप के प्रायोजक बैंक के खाते में जाएगी।
सरकार का मानना है कि इस प्रकार के वित्तीय वितरण से डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे को बनाए रखने में आसानी होगी और तकनीकी कंपनियों तथा बैंकों को लगातार बेहतर सेवाएं देने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर व्यापारियों और आम जनता के मन में अभी भी कई तरह की दुविधाएं बनी हुई हैं, जिन्हें दूर करने के लिए लगातार स्पष्टीकरण दिए जा रहे हैं।
व्यापारियों की नाराजगी और नो यूपीआई डे का ऐलान
इस पूरे नए नियम और एमडीआर लागू किए जाने के विरोध में देश भर के व्यापारी संगठन खुलकर मैदान में आ चुके हैं। व्यापारियों का तर्क है कि इस तरह के शुल्कों से अंततः छोटे दुकानदारों और कारोबारियों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा, जो पहले ही विभिन्न प्रकार के करों और अनुपालन शुल्कों से जूझ रहे हैं। अपने इसी विरोध को दर्ज कराने के लिए देश भर के व्यापारियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार की है।
व्यापारी संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे सरकार के इस फैसले के खिलाफ अपना विरोध जताने के लिए कड़े कदम उठाएंगे। इस कड़ी में देश भर के व्यापारियों और दुकानदारों ने एक दिन के लिए यूपीआई से भुगतान न लेने का ऐलान किया है, जिसे 'नो यूपीआई डे' के रूप में देखा जा रहा है। उनका यह भी कहना है कि सरकार को डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए व्यापारियों को और अधिक राहत देनी चाहिए, न कि उन पर किसी भी रूप में अतिरिक्त वित्तीय दबाव बनाना चाहिए।
आगे क्या होगा और इस मामले का भविष्य
सुप्रीम कोर्ट में होने वाली इस हाई-प्रोफाइल सुनवाई पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। अदालत यह तय करेगी कि सरकार और नियामक संस्थाओं द्वारा बनाए गए इन नए नियमों में कानूनी और संवैधानिक रूप से कितनी स्थिरता है। यदि अदालत इस मामले में कोई कड़ा निर्देश देती है या याचिका के पक्ष में कोई टिप्पणी करती है, तो देश के डिजिटल पेमेंट सिस्टम में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, यह पूरा विवाद डिजिटल युग के उस नाजुक मोड़ पर खड़ा है जहां एक तरफ वित्तीय संस्थानों को तकनीकी बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए धन की आवश्यकता है, तो दूसरी तरफ आम जनता और छोटे कारोबारी पूरी तरह से मुफ्त और सुगम डिजिटल सेवाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला यह तय करेगा कि भारत के डिजिटल भुगतान का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा।







