नई दिल्ली/तेहरान — पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट का आसमान एक बार फिर काले बादलों से घिर गया है। यमन संकट को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। ईरान ने सीधे शब्दों में पाकिस्तान और तुर्किए को आगाह किया है कि वे सऊदी अरब के पक्ष में यमन की जंग में दखल देने की गलती न करें। तेहरान का साफ कहना है कि यदि बाहरी देशों ने इस संघर्ष में कदम रखा, तो इसके नतीजे बेहद खतरनाक और दूरगामी होंगे। इस चेतावनी के बाद से इस्लामिक देशों के कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है और कयासों का दौर शुरू हो गया है।
दूसरी ओर, जमीन पर हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सऊदी अरब की राजधानी रियाद और दम्माम एयरपोर्ट पर हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर भीषण ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इन हमलों में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है और ग्यारह लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। हूती विद्रोहियों का यह हमला सिर्फ यहीं नहीं रुका, बल्कि उन्होंने सऊदी अरामको के ठिकानों और रणनीतिक पोर्ट सिटी यांबू को भी दहलाने का दावा किया है। इन लगातार हमलों ने सऊदी सुरक्षा तंत्र और क्षेत्रीय स्थिरता के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका और ईरान की तनातनी
इस बीच, वैश्विक महाशक्ति अमेरिका और ईरान के बीच समुद्र में वर्चस्व की जंग और तीखी हो गई है। वाशिंगटन ने ईरान की उन तमाम शर्तों को सिरे से खारिज कर दिया है, जो उसने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल टैंकरों की आवाजाही को लेकर रखी थीं। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के रुख के जवाब में एक नया समुद्री नक्शा जारी किया है, जिसे अब अनौपचारिक रूप से 'ट्रंप स्ट्रेट' कहा जा रहा है। अमेरिका के इस कड़े कदम से ईरान की मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि इस मार्ग से होने वाले व्यापार पर उसकी पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है।
खाड़ी के दूसरे देशों ने भी ईरान की धौंस को दरकिनार करते हुए वैकल्पिक रास्तों की तलाश तेज कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, खाड़ी देशों ने सुरक्षित और वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करके अपने तेल का निर्यात फिर से शुरू कर दिया है। इन वैकल्पिक रास्तों पर तेल टैंकरों की आवाजाही में अचानक भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईरान देखता रह गया और क्षेत्रीय देश अपने आर्थिक हितों को बचाने के लिए नए रास्तों से तेल भेजने लगे। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने में मदद मिल रही है, लेकिन ईरान की सामरिक स्थिति पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।
हूती हमलों और पोर्ट सिटी यांबू की जमीनी हकीकत
यमन के रास्ते हो रहे इन हमलों और क्षेत्रीय उठापटक के पीछे ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। पोर्ट सिटी यांबू पर हुआ हालिया हमला इस बात का सबूत है कि विद्रोही अब सऊदी अरब के आर्थिक और ऊर्जा ठिकानों को सीधे निशाना बना रहे हैं। सऊदी अरामको के instalaciones पर मंडराता खतरा दुनिया भर के तेल बाजारों को डराने के लिए काफी है। पिछले कुछ हफ्तों में जिस तरह से ड्रोन हमलों की संख्या बढ़ी है, उससे साफ है कि यमन की लड़ाई अब स्थानीय दायरे से निकलकर पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले चुकी है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान और तुर्किए के लिए इस जंग में कूदना तलवार की धार पर चलने जैसा होगा। एक तरफ पारंपरिक मित्र सऊदी अरब का दबाव है, तो दूसरी तरफ ईरान की सीधी चेतावनी और क्षेत्रीय युद्ध का खतरा है। इस्लामाबाद और अंकारा दोनों ही राजधानियों में इस वक्त गहन मंथन चल रहा है कि इस संवेदनशील कूटनीतिक जाल से कैसे बचा जाए। यमन की ज़मीन पर सुलग रही यह आग कब विकराल रूप लेगी, यह आने वाले कुछ दिनों के घटनाक्रम और कूटनीतिक बैठकों के नतीजों पर निर्भर करेगा।
ईरान की चेतावनी और अमेरिका के नए समुद्री नक्शे के मायने
विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका द्वारा होर्मुज के विकल्प के रूप में नया समुद्री नक्शा जारी करना महज एक कूटनीतिक चाल नहीं है, बल्कि यह जमीन पर एक नया रणनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश है। ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल निर्यात और इस समुद्री मार्ग के नियंत्रण पर टिकी है। जब खाड़ी देश वैकल्पिक रास्तों से तेल भेजने लगते हैं और अमेरिका अपनी शर्तों पर समुद्री नक्शे बदलता है, तो तेहरान पर दबाव कई गुना बढ़ जाता है। ऐसे में पाकिस्तान और तुर्किए को यमन में दखल न देने की चेतावनी देकर ईरान दरअसल अपने चारों तरफ बन रहे इस दबाव को कम करने की कोशिश कर रहा है।
'द फ्रीलान्स' की इस जमीनी और कूटनीतिक पड़ताल से साफ है कि मिडिल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है। ऊर्जा आपूर्ति के रास्ते बदलने से लेकर सैन्य हमलों के तेज होने तक, हर घटना आने वाले बड़े संघर्ष का संकेत दे रही है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं, यह स्थिति गहरी चिंता का विषय है। भारतीय कूटनीति के लिए यह वक्त बेहद फूंक-फूंक कर कदम रखने का है, क्योंकि खाड़ी की आग का असर सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था और वहां काम कर रहे करोड़ों प्रवासियों पर पड़ सकता है।










