नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल लाने वाले शिवसेना के असली वारिस कौन हैं, इस सवाल पर अब सुप्रीम कोर्ट में रोज नई और बड़ी दलीलें सामने आ रही हैं। सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट ने निर्वाचन आयोग के उस फैसले का खुलकर बचाव किया है जिसमें पार्टी का नाम शिवसेना और उसका पारंपरिक चुनाव चिह्न तीर-कमान शिंदे गुट को सौंप दिया गया था। अदालत कक्ष में शिंदे गुट के वकीलों ने साफ शब्दों में कहा कि पार्टी के नाम और निशान पर उनका दावा पूरी तरह कानूनी, तार्किक और स्वाभाविक है। इस लंबी और अहम कानूनी जंग पर देश भर की निगाहें टिकी हुई हैं क्योंकि इसका असर महाराष्ट्र के राजनीतिक भविष्य पर सीधा पड़ने वाला है।
बीते मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में चली सुनवाई के दौरान शिंदे गुट की ओर से पेश हुए वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश के सामने अपनी बात रखी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि निर्वाचन आयोग ने तमाम दस्तावेजों, बहुमत के आंकड़ों और पार्टी के संविधान की गहराई से जांच करने के बाद ही यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। शिंदे खेमे का तर्क है कि पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद उनके साथ हैं, इसलिए संगठन का असली ढांचा उन्हीं के पास है। वकीलों ने अदालत में यह भी दलील दी कि बहुमत के आधार पर लिया गया यह फैसला पूरी तरह निष्पक्ष है और इसमें कानून के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया गया है।
निर्वाचन आयोग के फैसले पर कानूनी बहस तेज
इस पूरे विवाद की जड़ में वह पुराना राजनीतिक संकट है जब शिवसेना में दो फाड़ हो गई थी और एकनाथ शिंदे ने पार्टी के भीतर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया था। उस वक्त शिंदे के साथ शिवसेना के अधिकांश विधायकों ने समर्थन जताया था, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में नई सरकार का गठन किया था। इसके बाद दोनों ही गुटों ने असली शिवसेना होने का दावा ठोक दिया था और मामला चुनाव आयोग तक जा पहुंचा था। आयोग ने लंबी सुनवाई के बाद शिंदे गुट को ही असली शिवसेना माना था और उन्हें पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की आधिकारिक अनुमति दे दी थी, जिसे अब उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
दूसरी तरफ, उद्धव ठाकरे गुट के वकीलों का यह कहना है कि निर्वाचन आयोग का यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया था और इसमें पूरी प्रक्रिया का सही पालन नहीं हुआ था। ठाकरे गुट का यह भी तर्क है कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किसी चुनिंदा नेताओं का नहीं बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं का है जिन्होंने सालों-साल मेहनत करके इस संगठन को सींचा है। अदालत में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि विधानसभा स्पीकर द्वारा विधायकों की अयोग्यता पर लिया गया फैसला भविष्य में गलत साबित होता है, तो क्या चुनाव आयोग द्वारा दिए गए इस चिह्न आवंटन पर फिर से विचार किया जाना चाहिए या नहीं। इस बिंदु पर दोनों पक्षों के बीच जोरदार कानूनी बहस चल रही है।
स्पीकर के फैसले और चुनाव चिह्न के बीच का पेंच
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह बेंच इस मामले में कोई बहुत बड़ा और दूरगामी फैसला सुना सकती है। अदालत यह तय करेगी कि राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और बहुमत साबित करने के पैमाने क्या होने चाहिए। यदि स्पीकर के अयोग्यता मामलों में कोई बदलाव आता है, तो उसका सीधा असर इस केस की पूरी दिशा पर पड़ेगा। फिलहाल देश की सबसे बड़ी अदालत हर एक पहलू की बारीकी से जांच कर रही है और दोनों पक्षों के वकीलों को अपनी दलीलें रखने के लिए पूरा समय दिया जा रहा है।
महाराष्ट्र के आम लोगों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच भी इस बात की भारी चर्चा है कि अदालत का अंतिम फैसला क्या होगा। एक तरफ जहां शिंदे गुट को पूरा भरोसा है कि उनका पलड़ा भारी रहेगा, वहीं ठाकरे खेमे को भी न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है। जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ रही है, राजनीतिक हलचलें और तेज होती जा रही हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल में यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मामला भारतीय राजनीति और संविधान की कई नई परिभाषाएं तय करेगा, जिस पर हमारी पैनी नजर बनी रहेगी।
भविष्य की राजनीतिक चालें और अदालत का रुख
अदालत में चल रही इन बहसों के बीच महाराष्ट्र की सियासत शांत बैठने वाली नहीं है। दोनों ही गुट आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों और अन्य राजनीतिक मोर्चों की तैयारियों में जुट गए हैं। पार्टी का नाम और निशान किसके पास पक्के तौर पर रहेगा, इसका अंतिम कानूनी ठप्पा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही लगेगा। तब तक राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी दांव-पेंच का यह दौर ऐसे ही जारी रहने की पूरी उम्मीद है।


