नई दिल्ली/बाकू — अज़रबैजान के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर लगाए गए नए प्रतिबंधों के बाद इस्लामिक दुनिया में एक नया भूचाल आ गया है। अज़रबैजान की सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब पहनकर आने पर पाबंदी लगा दी है। इस फैसले के बाद देश की राजधानी बाकू समेत कई शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि इसका असर अब पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक रिश्तों पर भी साफ दिखने लगा है।
इस पूरे मामले पर तुर्की के तेवर काफी सख्त नजर आ रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन की सरकार ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है। तुर्की का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ हैं और इससे मुस्लिम समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। दूसरी ओर अज़रबैजान की सरकार अपने इस फैसले को धर्मनिरपेक्षता और देश के कानूनों की रक्षा के नाम पर पूरी तरह सही ठहरा रही है।
मुस्लिम बहुल देश में छात्राओं का छलका दर्द
अज़रबैजान की आबादी में बहुसंख्यक मुस्लिम हैं, लेकिन देश का संविधान पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर चलता है। नए नियमों के लागू होने के बाद कई शिक्षण संस्थानों के बाहर से ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जहां छात्राओं को कक्षाओं के बाहर रोका जा रहा है। रोती हुई और परेशान छात्राएं अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए गुहार लगा रही हैं। इन वीडियो के सोशल मीडिया पर आने के बाद दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों और धार्मिक समूहों में तीखी बहस छिड़ गई है।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रशासन का कहना है कि स्कूलों में एक समान ड्रेस कोड होना जरूरी है। अधिकारियों का तर्क है कि शैक्षणिक परिसरों में धार्मिक पहचान को बढ़ावा देने से समाज में दूरियां बढ़ सकती हैं। हालांकि, प्रभावित छात्राओं और उनके परिवारों का साफ कहना है कि पढ़ाई उनका हक है और उनके धार्मिक पहनावे से किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इस दोतरफा खींचतान ने आम नागरिकों की मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं।
पाकिस्तान के दो करीबी देशों के बीच बढ़ी कूटनीतिक दूरी
इस पूरे घटनाक्रम का एक बड़ा भू-राजनीतिक पहलू पाकिस्तान के साथ भी जुड़ा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अज़रबैजान और तुर्की दोनों ही पाकिस्तान के बहुत करीबी दोस्त माने जाते हैं। लेकिन हिजाब के मुद्दे पर इन दोनों देशों के आमने-सामने आने से इस्लामाबाद के लिए कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा हो गई है। पाकिस्तान के ये दोनों ही मित्र देश अब आपसी बयानबाजी में उलझते जा रहे हैं।
तुर्की के लगातार विरोध जताने पर अज़रबैजान के राजनीतिक हलकों से भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। अज़रबैजान के कई नेताओं ने तुर्की को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि वे देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी बंद करें। जानकारों का कहना है कि क्षेत्रीय राजनीति और प्रभाव की इस लड़ाई में आने वाले दिनों में यह तनाव और ज्यादा गहरा सकता है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल और आगे का रुख
द फ्रीलान्स की टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, इस मामले पर फिलहाल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान तलाशने की कोशिशें जारी हैं। हालांकि, अज़रबैजान सरकार ने अभी तक अपने फैसले में किसी भी तरह के बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं। स्कूल और कॉलेज परिसरों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए गए हैं ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या तुर्की का दबाव अज़रबैजान की सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर पाता है या नहीं। फिलहाल इस विवाद ने मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के राजनीतिक समीकरणों में एक नई हलचल पैदा कर दी है, जिस पर पूरी दुनिया की पैनी नजर बनी हुई है।






