नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के चुनावी मैदान में इन दिनों गजब की हलचल देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और उत्तराखंड तक, चुनाव लड़ने के तरीके और प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि हर किसी को हैरान कर रही है। एक तरफ जहां प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में कदम रखने वाले लोग अपनी नई जमीन तलाश रहे हैं, वहीं जेल की सलाखों के पीछे से भी चुनाव जीतने की जुगत लगाई जा रही है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब इस पूरे चुनावी परिदृश्य की जमीनी पड़ताल की, तो एक के बाद एक कई दिलचस्प और चौंकाने वाले मामले सामने आए जो आम चुनाव से बिल्कुल अलग रंग में रंगे हैं।
इस सियासी हलचल में सबसे बड़ा नाम उत्तर प्रदेश की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल का है। उन्होंने अपनी प्रशासनिक नौकरी छोड़कर सीधे राजनीति के अखाड़े में उतरने का बड़ा फैसला किया है। दिव्या मित्तल ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है और वह मिर्जापुर से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं। उनके इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि एक तेज-तर्रार अफसर अब सीधे जनता के बीच जाकर सियासी समीकरण कैसे साधेगी। उनके साथ जुड़ा 'लहुरियादह' मामला भी इन दिनों काफी चर्चा में है, जिसे वह अपने राजनीतिक सफर का एक अहम हिस्सा बता रही हैं।
नागौर से लेकर जोधपुर तक, स्थानीय चुनावों के अजीबोगरीब रंग
सिर्फ बड़े चेहरे ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर के चुनावों में भी गजब की टक्कर देखने को मिल रही है। राजस्थान के नागौर जिले से एक बेहद अनोखा मामला सामने आया है जहां एक निर्दलीय महिला प्रत्याशी जेल के अंदर से ही चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। कभी आईएएस बनने का सपना देखने वाली इस महिला ने परिस्थितियों के आगे टूटने के बजाय राजनीति का कठिन रास्ता चुना है। विदेश में अच्छी नौकरी छोड़ने के बाद अब वह जेल से ही अपना चुनावी प्रचार अभियान चलाएगी, जिसे लेकर स्थानीय प्रशासन और जेल अधिकारियों के बीच भी सुरक्षा और नियमों को लेकर माथापच्ची शुरू हो गई है।
दूसरी तरफ, जोधपुर जिला परिषद चुनाव में तो खून का रिश्ता ही आमने-सामने आ गया है। यहां एक ही नाम के दो प्रत्याशी और वो भी सगे भाई, एक ही पार्टी से चुनावी मैदान में आमने-सामने खड़े हैं। भाई बनाम भाई की इस टक्कर ने जोधपुर के राजनीतिक माहौल का पारा पूरी तरह से चढ़ा दिया है। मतदाता भी असमंजस में हैं कि आखिर अपने ही घर के इन दो दावेदारों में से किसे चुना जाए। इसी तरह का एक कड़ा मुकाबला उत्तराखंड के ऋषिकेश में भी देखने को मिला है, जहां जिला योजना समिति के चुनाव में प्रदीप और मोंटी के बीच सीधी और कांटे की टक्कर ने स्थानीय राजनीति को गरमा दिया है।
बदलते चुनावी समीकरण और जनता का मिजाज
इन तमाम अलग-अलग जगहों की चुनावी कहानियों से एक बात तो साफ है कि इस बार का मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं है। यह चुनाव व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, पारिवारिक प्रतिष्ठा और प्रशासनिक अनुभव से उपजी नई उम्मीदों की एक अनोखी प्रयोगशाला बन चुका है। एक तरफ जहां पारंपरिक राजनीतिक दल अपने पुराने समीकरण बिठाने में जुटे हैं, वहीं ऐसे विद्रोही और अनोखे निर्दलीय उम्मीदवार मुख्यधारा की राजनीति को खुली चुनौती दे रहे हैं। जनता भी इन चेहरों को बहुत ही बारीकी से देख रही है और आने वाले दिनों में यह मुकाबला और ज्यादा रोमांचक होने की पूरी उम्मीद है।
'द फ्रीलान्स' की इस शुरुआती पड़ताल से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय चुनाव अब केवल पारंपरिक रैलियों और भाषणों तक सीमित नहीं रहे हैं। जेल की दीवारों के पीछे से लेकर पूर्व अधिकारियों के सियासी दांव-पेच और सगे भाइयों की चुनावी जंग ने इसे पूरी तरह से नया मोड़ दे दिया है। जैसे-जैसे मतदान की तारीखें नजदीक आएंगी, इन सभी सीटों पर देश भर की निगाहें टिकी रहेंगी। हमारी टीम जमीनी स्तर पर इन सभी उम्मीदवारों के हर कदम पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी ताकि पाठकों तक हर एक सच बिल्कुल सटीक रूप में पहुंच सके।






