मुंबई की चमकदार और चकाचौंध भरी दुनिया के पीछे तकनीक का एक ऐसा काला साया मंडराने लगा है, जिसने कलाकारों की नींद उड़ा दी है। हाल ही में जान्हवी कपूर और समांथा रुथ प्रभु से जुड़े डीपफेक मामलों के बाद, अब अभिनेत्री यामी गौतम ने भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बेलगाम इस्तेमाल पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। नेशनल अवॉर्ड विनिंग अभिनेत्री ने सोशल मीडिया के जरिए दो टूक शब्दों में कहा है कि उनकी पब्लिक अपीयरेंस की तस्वीरों के साथ बिना उनकी अनुमति के कोई भी छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यामी गौतम की दो टूक: 'मेरी तस्वीरों को उनके मूल रूप में ही रहने दें'
रविवार को अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट पर एक कड़े संदेश में यामी गौतम ने लिखा कि मीडिया और प्रशंसकों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में ली गई उनकी तस्वीरों को एआई के माध्यम से बदलने या 'बेहतर' दिखाने के नाम पर रूप-रंग बदलने से बचना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति की तस्वीर या उसकी शारीरिक बनावट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग उसकी स्पष्ट सहमति के बिना किया जाना एक गंभीर नैतिक और व्यक्तिगत उल्लंघन है। यामी का यह बयान ऐसे समय आया है जब फिल्म इंडस्ट्री के तमाम दिग्गज कलाकार इस डिजिटल अराजकता के खिलाफ खुलकर सामने आ रहे हैं।
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प्रमुख बिंदु व पड़ताल
- कानूनी शिकंजा और अदालती आदेश: हाल ही में बांबे हाईकोर्ट ने समांथा रुथ प्रभु से जुड़े आपत्तिजनक और एआई-जनित डीपफेक कंटेंट को तुरंत हटाने के निर्देश दिए हैं, जो कलाकारों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है।
- 'चुट्टमल्ले' विवाद: फिल्म 'देवरा पार्ट 1' के लोकप्रिय गाने में जान्हवी कपूर के चेहरे को एआई तकनीक के जरिए मॉर्फ कर एक आपत्तिजनक वीडियो वायरल किया गया था, जिस पर अभिनेता जूनियर एनटीआर ने कड़ी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है।
- सहयोगियों की तीखी प्रतिक्रिया: अभिनेता विजय देवरकोंडा ने इस तरह के कृत्यों को 'डिजिटल यौन उत्पीड़न' करार दिया है, वहीं मेगास्टार चिरंजीवी ने इसे बेहद क्रूर और शर्मनाक बताते हुए समाज के हर वर्ग के लिए चेतावनी माना है।
तकनीक के इस दौर में जहां एक ओर एआई सृजन और कला के नए आयाम खोल रहा है, वहीं दूसरी ओर इसका दुरुपयोग कलाकारों की गरिमा को तार-तार कर रहा है। यामी गौतम और उनके समकालीनों की यह आवाज़ इस बात का प्रमाण है कि अब डिजिटल स्पेस में कड़ी नैतिकता और सख्त कानूनों की मांग और अधिक मुखर हो चुकी है। 'द फ्रीलांस' की इस पड़ताल से यह स्पष्ट है कि यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह समस्या आम नागरिकों के जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है।







