मध्य पूर्व में सुलगती आग और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट
दुनिया एक बार फिर ऐसे मुहाने पर खड़ी है जहां जरा सी चूक वैश्विक बाजार को हिलाकर रख सकती है। अमेरिका, ईरान और पश्चिम एशिया के अन्य देशों के बीच लंबे समय से जारी भू-राजनीतिक तनाव अब केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है। इस संघर्ष की आंच सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रही है। वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टें इस बात की गवाही दे रही हैं कि यदि यह गतिरोध जल्द नहीं थमा, तो दुनिया भर के बाजारों में मंहगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी एक अहम रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध के कारण ऊर्जा उत्पादन और समुद्री परिवहन बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। संस्था का साफ कहना है कि तेल उत्पादक देशों के लिए अपनी पुरानी विकास दर या युद्ध-पूर्व आर्थिक स्थिति में वापस लौटना फिलहाल बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। जिन देशों ने अब तक अपने वित्तीय भंडारों के बल पर इस शुरुआती झटके को झेल लिया था, उनकी सहनशक्ति भी अब जवाब देने लगी है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा प्रभाव उन देशों पर पड़ेगा जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव घरेलू बजट, परिवहन लागत और मुद्रास्फीति पर सीधा असर डालता है। यही वजह है कि नई दिल्ली में बैठे नीति निर्माता भी इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश तेज कर दी गई है.
कतर की खौफनाक चेतावनी: ऊर्जा सप्लाई पर मंडराया अभूतपूर्व खतरा
वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली तब और मच गई जब दुनिया के सबसे बड़े तरल प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यातक देशों में शुमार कतर की तरफ से एक बेहद सख्त और डराने वाला संदेश सामने आया। कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने देश की शूरा काउंसिल के वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए दुनिया को आगाह किया कि आने वाले दिन और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं और सभी को सबसे खराब परिस्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।
कतर दुनिया के कुल एलएनजी व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। ऐसे में वहां से आने वाली किसी भी प्रकार की बुरी खबर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को झकझोर देती है। अमीर अल थानी ने अपने संबोधन में फारस की खाड़ी और जलमार्गों की सुरक्षा पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कतर पर हो रहे हमलों को देश की संप्रभुता का खुला उल्लंघन करार दिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समुद्री परिवहन को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की।
"हमें आने वाले दिनों में सबसे खराब स्थितियों के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा। कतर की ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली किसी भी रुकावट का असर सीधे तौर पर दुनिया भर के बाजारों और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है, इसलिए सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।" — शेख तमीम बिन हमद अल थानी, कतर के अमीर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए फारस की खाड़ी का तेल और गैस पूरी दुनिया में सप्लाई होता है। इस मार्ग पर किसी भी तरह का प्रतिबंध या नाकाबंदी वैश्विक अर्थव्यवस्था के पहिए जाम करने के लिए काफी है। रास लाफान ऊर्जा केंद्र को संभावित नुकसान और परिवहन मार्गों के बाधित होने से कतर को भी अपने निर्यात में भारी रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव आयातकों पर पड़ रहा है।
भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा इसका दूरगामी असर?
मध्य पूर्व के इस सुलगते रण का भारत पर सीधा और गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है। भारत अपनी कुल तेल और गैस की जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों से ही आयात करता है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य या इस क्षेत्र के अन्य परिवहन मार्ग लंबे समय तक बाधित रहते हैं, तो भारत में ईंधन के दाम आसमान छू सकते हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आते ही देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) के दाम बढ़ जाएंगे। इससे न केवल आम आदमी का मासिक बजट गड़बड़ाएगा, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से हर रोजमर्रा की वस्तुएं और खाद्य पदार्थ भी महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा, महंगाई बढ़ने से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने ब्याज दरों को नियंत्रित रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।
सरकार और सरकारी तेल कंपनियां इस संभावित संकट से निपटने के लिए पहले से ही वैकल्पिक रणनीतियों पर काम कर रही हैं। रूस और अन्य गैर-मध्य पूर्वी देशों से कच्चे तेल के आयात के विकल्प खुले रखे गए हैं, ताकि घरेलू बाजार में अचानक से ईंधन की भारी किल्लत न हो। हालांकि, वैश्विक स्तर पर यदि कीमतें लंबे समय तक उच्च बनी रहती हैं, तो इसका असर देश के राजकोषीय घाटे और समग्र विकास दर पर भी पड़ सकता है।
वैश्विक कूटनीति और शांति की अपील
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तेज हो गई है। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न वैश्विक मंचों पर लगातार यह दबाव बनाया जा रहा है कि अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के बीच चल रहे इस टकराव को बातचीत के जरिए सुलझाया जाए। सैन्य संघर्ष के लंबे खींचने से न केवल मध्य पूर्व का ढांचा तहस-नहस हो रहा है, बल्कि दुनिया भर के करोड़ों आम लोग इसकी आर्थिक कीमत चुकाने को मजबूर हो रहे हैं।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया अभी भी कोरोना महामारी और पिछले कुछ सालों के वैश्विक संघर्षों के आर्थिक दुष्प्रभावों से पूरी तरह उबर नहीं पाई है। ऐसे में मध्य पूर्व का यह नया संकट वैश्विक रिकवरी की रफ्तार को पटरी से उतार सकता है। अब यह देखना बेहद अहम होगा कि आने वाले हफ्तों में कूटनीतिक प्रयास कितने रंग लाते हैं और क्या इस ऊर्जा संकट को टालने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय सफल हो पाता है या नहीं।











