वैश्विक रक्षा परिदृश्य में अमेरिकी रणनीति का नया दौर
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रक्षा गलियारों से मिल रही खुफिया जानकारियों के मुताबिक, दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने अपनी सैन्य प्राथमिकताओं में व्यापक फेरबदल करना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ महीनों में मिडिल ईस्ट और अन्य संघर्ष क्षेत्रों में रणनीतिक चुनौतियों का सामना करने के बाद, पेंटागन का पूरा ध्यान अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी भूमिगत मिसाइल सुरक्षा प्रणालियों पर टिक गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब पारंपरिक मैदानों से निकलकर कंक्रीट के पहाड़ों और गहरी भूमिगत सुरंगों तक पहुंच चुका है, जिसे भेदना पारंपरिक हथियारों के बूते से बाहर साबित हो रहा है।
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की प्राथमिक रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि वाशिंगटन ने अपने पारंपरिक सैन्य साजो-सामान की सीमाओं को पहचानते हुए अगली पीढ़ी के आक्रामक हथियारों के विकास में तेजी ला दी है। इसी कड़ी में, टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों के उन्नत संस्करणों और भारी विनाशक क्षमताओं वाले बंकर बस्टर हथियारों को नए सिरे से डिजाइन किया जा रहा है। रक्षा रणनीतिकारों का मानना है कि यह बदलाव केवल हथियारों की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक महाशक्तियों के बीच शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित करने की एक सोची-समझी कवायद है।
टॉमहॉक मिसाइलों की अचूक मारक क्षमता और तकनीकी खूबियां
अमेरिकी नौसेना और थल सेना के बेड़े में दशकों से शामिल रही टॉमहॉक (BGM-109) क्रूज मिसाइलें आधुनिक युद्ध की धुरी मानी जाती रही हैं। इन मिसाइलों ने अपनी लंबी दूरी, बहु-प्लेटफ़ॉर्म अनुकूलता और पिन-पॉइंट सटीकता के कारण अपनी अलग पहचान बनाई है। एक मानक टॉमहॉक मिसाइल की लंबाई करीब 5.56 मीटर होती है और इसका प्रक्षेपण भार लगभग 1,300 किलोग्राम से अधिक होता है। विलियम्स टर्बोफैन इंजन और सॉलिड-फ्यूल बूस्टर के मेल से यह मिसाइल करीब 880 से 920 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरने में सक्षम है।
नवीनतम ब्लॉक IV और ब्लॉक V वेरिएंट्स की मारक क्षमता 1,600 किलोमीटर से लेकर कुछ विशिष्ट कॉन्फ़िगरेशन में 2,500 किलोमीटर तक आंकी गई है। इन मिसाइलों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे जमीन से महज 30 से 50 मीटर की ऊंचाई पर बेहद नीची उड़ान भर सकती हैं। इससे वे दुश्मन देशों के रडार तंत्र को आसानी से चकमा देने में कामयाब रहती हैं। जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली, उन्नत जीपीएस, टेरकॉम टेरेन मैचिंग और अंतिम चरण के ऑप्टिकल सेंसर इन मिसाइलों को दुनिया की सबसे घातक क्रूज मिसाइलों की श्रेणी में खड़ा करते हैं।
चीन की भूमिगत मिसाइल दीवारों और पर्वतीय साइलो पर अमेरिकी नजर
अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा पर्वतों और चट्टानों के भीतर बनाई गई भूमिगत मिसाइल प्रणालियां हैं। बीजिंग ने अपने परमाणु और पारंपरिक मिसाइल शस्त्रागार को इस तरह से सुरक्षित किया है कि सामान्य हवाई हमले या मिसाइलें उन तक नहीं पहुंच सकतीं। इन जटिल रक्षात्मक संरचनाओं को भेदने के लिए ही अमेरिकी सेना अब विशेष रूप से डिजाइन की गई टॉमहॉक बंकर बस्टर मिसाइलों और अन्य भारी ऑर्डनेंस के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रही है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेना ने टाइफॉन ग्राउंड-बेस्ड लॉन्च सिस्टम के जरिए इन मिसाइलों के सफल परीक्षण भी किए हैं। इसके अलावा, ईरान के पिकएक्स माउंटेन जैसे गहरे दबे ऊर्जा और परमाणु बुनियादी ढांचा स्थलों पर पूर्व में आए अनुभवों से सीख लेते हुए, पेंटागन ने अपनी मारक क्षमता को और अधिक संवर्धित करने का निर्देश दिया है। रक्षा जानकारों का कहना है कि भविष्य के किसी भी संभावित संघर्ष में दुश्मन की कंक्रीट की दीवारों को ध्वस्त करना ही अमेरिकी वायु और थल सेना की पहली प्राथमिकता होगी।
राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर घरेलू दबाव की चुनौती
एक तरफ जहां अमेरिका अपनी सैन्य ताकत को आधुनिक बनाने की दौड़ में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू मोर्चे पर व्हाइट हाउस को तीखे राजनीतिक और आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है। देश में आगामी मिडटर्म चुनावों की सरगर्मी के बीच आम नागरिक महंगाई, आसमान छूती रोजमर्रा की चीजों के दाम और पेट्रोल-डीजल की कीमतों से बुरी तरह त्रस्त हैं। वाशिंगटन पोस्ट और अन्य प्रमुख अमेरिकी सर्वे रिपोर्ट्स बताती हैं कि ग्रामीण इलाकों के मतदाता महंगे युद्ध अभियानों और विदेशों में बेहिसाब पैसा झोंकने की नीतियों से खासे नाराज नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के संघर्षों में अमेरिका की सीधी दखलअंदाजी ने देश के आर्थिक बजट पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। ट्रंप प्रशासन द्वारा उठाए गए टैरिफ कदमों और आयातित सामानों पर टैक्स ने अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर डाला है। ऐसे में, रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी और नए खतरनाक हथियारों के विकास को जनता के बीच न्यायसंगत ठहराना व्हाइट हाउस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। चुनावों के नतीजे अमेरिकी विदेश नीति और रक्षा खर्च की दिशा को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
वैश्विक भू-राजनीति और भारत पर संभावित प्रभाव
अमेरिका और चीन के बीच चल रही इस सामरिक रस्साकशी का सीधा असर दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ना तय है। भारत जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश के लिए यह विकासक्रम बेहद संवेदनशील और सतर्क रहने वाला है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका द्वारा अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक और बंकर बस्टर हथियारों का विकास भविष्य के युद्धों के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल देगा। यदि हिंद महासागर और तटीय क्षेत्रों में सामरिक तनाव बढ़ता है, तो भारत को भी अपनी बहु-आयामी रक्षा तैयारियों और मिसाइल डिफेंस शील्ड को और अधिक मजबूत करना होगा।
कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर हथियारों की यह नई दौड़ दुनिया को एक बार फिर शीत युद्ध के दौर की याद दिला रही है। जहां एक तरफ महाशक्तियां अपनी रक्षा तकनीक को अजेय बनाने में जुटी हैं, वहीं वैश्विक स्तर पर शांति और आर्थिक स्थिरता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। आने वाले महीनों में अमेरिकी रक्षा विभाग के ये नए प्रोजेक्ट्स वैश्विक कूटनीति की दशा और दिशा दोनों तय करेंगे।












