धूम्रपान नहीं करते, फिर भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा क्यों?
आम तौर पर यही माना जाता है कि फेफड़ों का कैंसर सिर्फ उन लोगों को होता है जो तंबाकू या सिगरेट का सेवन करते हैं। हालांकि, मेडिकल साइंस की दुनिया में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जिन्होंने इस धारणा को चुनौती दी है। कई ऐसे लोग भी इस गंभीर बीमारी की चपेट में आ जाते हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी सिगरेट या तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाया होता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिना धूम्रपान करने वाले स्वस्थ लोगों के फेफड़ों में कैंसर की कोशिकाएं कैसे पनप जाती हैं?
हाल ही में 'साइंस' पत्रिका में प्रकाशित एक बेहद चौंकाने वाले और बड़े शोध ने इस गुत्थी को सुलझाने की दिशा में एक नया रास्ता दिखाया है। इस नए अध्ययन से यह पता चलता है कि कई मामलों में इसके पीछे जन्मजात आनुवंशिक कारक या दुर्लभ जीन जिम्मेदार हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने अपनी इस रिसर्च के जरिए यह समझने की कोशिश की है कि तंबाकू के सेवन के बिना भी शरीर के भीतर कैंसर जैसी घातक बीमारी का जोखिम कैसे पैदा हो सकता है, जो आने वाले समय में मेडिकल रिसर्च के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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33 लाख लोगों पर हुआ अब तक का सबसे बड़ा आनुवंशिक अध्ययन
इस महत्वपूर्ण शोध को अंजाम देने के लिए दाना-फ़ार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट और 23एंडमी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक बहुत बड़ा कदम उठाया। शोधकर्ताओं ने 23एंडमी अध्ययन में भाग लेने वाले यूरोपीय मूल के 33 लाख से अधिक लोगों के विशाल आनुवंशिक डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया। इतने बड़े पैमाने पर किए गए डेटा विश्लेषण के कारण इस रिसर्च के परिणाम बेहद सटीक और भरोसेमंद माने जा रहे हैं, जिन्होंने चिकित्सा जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
शोधकर्ताओं ने अपने इस विश्लेषण के दौरान ईजीएफआर (EGFR) जीन के एक बेहद दुर्लभ प्रकार, जिसे 'EGFR T790M' कहा जाता है, पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया। शुरुआती परिणामों से यह बात सामने आई कि जिन लोगों के शरीर में यह विशेष जीन वेरिएंट मौजूद था, उनमें फेफड़ों के कैंसर के विकसित होने की संभावना उन लोगों की तुलना में लगभग 25 गुना अधिक थी, जिनके पास यह वेरिएंट नहीं था। और जब शोधकर्ताओं ने केवल उन लोगों के समूह का अध्ययन किया जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था, तो यह अंतर बढ़कर लगभग 62 गुना तक पहुंच गया।
"यह अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि कुछ लोगों में आनुवंशिक रूप से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम क्यों अधिक होता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इस जीन के होने से कैंसर होना तय है।" — डॉ. जैकलिन लोपिकोलो, प्रमुख शोधकर्ता और चिकित्सक, दाना-फ़ार्बर कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट
जन्मजात जीन और ट्यूमर में मिलने वाले म्यूटेशन में बड़ा अंतर
इस अध्ययन का सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि EGFR T790M एक वंशानुगत आनुवंशिक भिन्नता है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह किसी भी व्यक्ति की कोशिकाओं में जन्म के समय से ही मौजूद होता है और यह परिवार में माता-पिता से बच्चों में पीढ़ियों तक आगे बढ़ सकता है। यह सामान्य तौर पर फेफड़ों के कैंसर की कोशिकाओं में पाए जाने वाले कई अन्य EGFR उत्परिवर्तनों से पूरी तरह अलग होता है।
आम तौर पर कैंसर से जुड़े म्यूटेशन तब पैदा होते हैं जब शरीर की स्वस्थ कोशिकाएं कैंसर कोशिकाओं में बदलने की प्रक्रिया से गुजरती हैं, और वे जरूरी नहीं कि माता-पिता से बच्चों में स्थानांतरित हों। लेकिन EGFR T790M वेरिएंट कैंसर के प्रकट होने या ट्यूमर बनने से बहुत पहले से ही शरीर के भीतर मौजूद रहता है। पिछले अध्ययनों में भी यह देखा गया है कि यह वेरिएंट उन परिवारों में अधिक मिलता है जिनके इतिहास में फेफड़ों के कैंसर के मामले ज्यादा रहे हैं, लेकिन इसकी अत्यधिक दुर्लभता के कारण वैज्ञानिक इसके वास्तविक जोखिम स्तर का सटीक आकलन नहीं कर पा रहे थे।
क्या स्वस्थ लोगों को इस दुर्लभ जीन की जांच करानी चाहिए?
इस शोध के सार्वजनिक होने के बाद से ही आम लोगों के मन में यह सवाल सबसे पहले आ रहा है कि क्या उन्हें भी इस दुर्लभ जीन के लिए अपनी जांच करानी चाहिए। इस पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों का रुख बेहद स्पष्ट है। उनका कहना है कि वर्तमान में उपलब्ध आंकड़ों और केवल इस अध्ययन के आधार पर किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को अपने स्तर पर ईजीएफआर टी790एम (EGFR T790M) की जांच करवाने की कोई आवश्यकता या आधिकारिक सिफारिश नहीं है।
फेफड़ों के कैंसर की जांच के लिए मौजूदा मेडिकल दिशानिर्देश मुख्य रूप से व्यक्ति की उम्र, उसके धूम्रपान के इतिहास और अन्य पहचाने गए पर्यावरणीय जोखिम कारकों पर ही आधारित होते हैं। हालांकि, इस नए शोध से यह जरूर उम्मीद बंधी है कि भविष्य में आनुवंशिक जानकारी का उपयोग उन लोगों की पहचान करने में किया जा सकेगा जो उच्च जोखिम श्रेणी में आते हैं लेकिन मौजूदा स्क्रीनिंग मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। वैज्ञानिक वर्तमान में 'INHERIT' नामक एक अध्ययन के जरिए यह भी पता लगा रहे हैं कि क्या इस जीन वाले लोगों को कम उम्र में ही कम खुराक वाले सीटी स्कैन करवाने चाहिए।
निष्कर्ष और आगे की राह
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह नया अध्ययन फेफड़ों के कैंसर के आनुवंशिक कारणों को समझने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। यह साफ करता है कि धूम्रपान न करने के बावजूद कुछ लोगों को यह बीमारी क्यों हो सकती है। हालांकि, इससे डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है। जिन लोगों के परिवार में फेफड़ों के कैंसर का पुराना इतिहास रहा है, या जिनके परिवार में एक से अधिक लोगों को ट्यूमर की समस्या रही है, वे इस विषय पर अपने डॉक्टर या किसी योग्य आनुवंशिक परामर्शदाता से चर्चा कर सकते हैं। चिकित्सा विज्ञान लगातार प्रगति कर रहा है और भविष्य में यह रिसर्च कई लोगों की जान बचाने में मददगार साबित हो सकती है।






