बेंगलुरु की सुलगती राजनीतिक ज़मीन पर इन दिनों चुनावी लोकतंत्र की शुचिता को लेकर एक नया संग्राम छिड़ गया है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन टीम जब कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों और ज़मीनी हक़ीक़त टटोलने उतरी, तो तस्वीर बेहद उलझी हुई और संगीन नज़र आई। मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर नागरिकों के मतदान के अधिकार और चुनावी मशीनरी की पारदर्शिता से जुड़ा है। हाल ही में राज्य में सुनियोजित तरीके से मतदाताओं के नाम कटवाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिसके बाद सियासत में उबाल आना लाजमी था।
कार्यकर्ताओं पर एफआईआर और भगवा खेमे की बेचैनी
मामले ने तूल तब पकड़ा जब निर्वाचन आयोग और स्थानीय प्रशासन की शिकायतों के आधार पर कुछ स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ नाम कटवाने के इस खेल में संलिप्तता को लेकर एफआईआर दर्ज की गई। विपक्षी दलों के तीखे हमलों के बीच पार्टी के भीतर भी हड़कंप मच गया। ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने लगा और कानूनी शिकंजा कसता देख राज्य नेतृत्व को समझ आ गया कि यदि समय रहते स्थिति को संभाला नहीं गया, तो इसका खामियाजा आगामी राजनीतिक समीकरणों में भुगतना पड़ सकता है। यही वजह है कि पार्टी ने अपनी पारंपरिक रणनीति से हटकर एक बार फिर अपने सबसे भरोसेमंद संकटमोचन पर दांव खेला है।
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येदियुरप्पा की एंट्री: डैमेज कंट्रोल और सियासी संदेश
विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी ने अपने सर्वमान्य और सबसे कद्दावर नेता, पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को सीधे मैदान में उतार दिया है। येदियुरप्पा का राजनीतिक कद और लिंगायत समुदाय के बीच उनकी पकड़ एक ऐसा सुरक्षा कवच है, जिसका इस्तेमाल पार्टी अक्सर विकट परिस्थितियों में करती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि येदियुरप्पा की सक्रियता न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए है, बल्कि यह सरकार और चुनाव आयोग को भी एक कड़ा राजनीतिक संदेश देने की रणनीति का हिस्सा है। वे पार्टी के लीगल सेल और स्थानीय यूनिट के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं ताकि कानूनी मोर्चे पर भी मजबूती से जवाब दिया जा सके।
एसआईआर (SIR) और चुनावी राज्यों में सुगबुगाहट
इस पूरे घटनाक्रम का दायरा केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं है। देश के अन्य हिस्सों में भी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूचियों के प्रबंधन को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। हाल ही में उत्तराखंड से भी एसआईआर के बाद महिला मतदाताओं की संख्या में 0.35 प्रतिशत की मामूली गिरावट के आंकड़े सामने आए हैं, जिसने महिला मतदाताओं के अधिकारों और सूची में पारदर्शिता को लेकर बहस छेड़ दी है। वहीं दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए हैं और यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे तक पहुंच चुका है। इन तमाम घटनाओं का एक बड़ा असर राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर पड़ रहा है।
राज्यसभा समीकरण और राजनीतिक चूकों का दौर
एक तरफ जहां मतदाता सूचियों और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चुनावी जोड़-तोड़ का सिलसिला भी जारी है। हाल ही में राज्यसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस पार्टी की ओर से मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना और इसके चलते बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों की जीत का रास्ता साफ होना, इस बात का प्रमाण है कि विपक्षी खेमे में रणनीतिक चूकें किस हद तक भारी पड़ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि कर्नाटक का मतदाता सूची विवाद और राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इन घटनाक्रमों का आने वाले चुनावी मौसम में दूरगामी असर देखने को मिलेगा। 'द फ्रीलान्स' इस पूरे प्रकरण पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखेगा।








