नई दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी के इस्तीफे को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। ऊपर से देखने पर यह विरोध लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए किया गया आंदोलन लगता है। लेकिन हमारी जमीनी पड़ताल और सामने आई कुछ खास तस्वीरों ने इस पूरे विरोध प्रदर्शन के असली और छिपे हुए मंसूबों को बेनकाब कर दिया है। प्रदर्शन की आड़ में राजनीतिक दल अपने पुराने सियासी समीकरण साधने की कोशिश में जुटे हैं। कैमरे में कैद हुई तस्वीरों और नेताओं के हाव-भाव से यह साफ हो गया है कि जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह एक सुनियोजित खेल खेला जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक दलों के आपसी रिश्तों में भी बड़ी खटास देखने को मिल रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर राजनीतिक दगाबाजी के पुराने आरोप एक बार फिर से ताजा हो गए हैं। जिन क्षेत्रीय दलों ने कभी राहुल गांधी पर भरोसा किया था, वही अब ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामलों में उन्हें खुला आईना दिखा रहे हैं। दक्षिण भारत के मजबूत राजनीतिक दल डीएमके ने राहुल गांधी की नीतियों पर खुलकर सवाल उठाए हैं। डीएमके के नेताओं ने यहां तक कह दिया है कि कुछ दलों का रवैया पूरी तरह दोमुंहा है जो सिर्फ अपने फायदे के लिए राजनीति करते हैं।
परीक्षा प्रणाली की नाकामी और राजनीतिक बयानबाजी
देश में बार-बार होने वाली परीक्षाओं की नाकामी और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। इन गंभीर मुद्दों पर राजनीति लगातार गरमाती जा रही है। विपक्षी दल इस नाकामी के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका साफ कहना है कि सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए पुरानी सरकारों की नीतियों को दोषी नहीं ठहरा सकती। युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है और हर बार परीक्षा रद्द होने से लाखों छात्रों की मेहनत पानी में मिल जाती है। सड़क से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ी हुई है और सरकार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है.
छात्रों के गुस्से और बढ़ते विरोध को देखते हुए सरकार ने संसद से एक कड़ा कानून पास कराया है। पेपर लीक रोकने वाले इस नए बिल के पास होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा जताया है कि इससे परीक्षा प्रणाली पर देश के युवाओं का भरोसा फिर से कायम होगा। सरकार का दावा है कि इस नए कानून के तहत नकल माफिया और पेपर लीक कराने वालों पर बहुत सख्त कार्रवाई की जाएगी। कानून बनने के बाद प्रशासन अब देश भर में अपनी तैयारियों को मजबूत कर रहा है ताकि आने वाले समय में किसी भी छात्र को परीक्षा में धांधली का शिकार न होना पड़े।
धर्मेंद्र प्रधान की चिट्ठी और युवाओं की भावनाएं
इस पूरे हंगामे के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का एक पत्र सामने आया है जिसने सियासी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। अपनी चिट्ठी में उन्होंने लिखा है कि पिछले दस दिनों से उनका मन बहुत दुखी था और वे युवाओं की भावनाओं का पूरा सम्मान करते हैं। शिक्षा मंत्री के इस भावनात्मक पत्र के बाद राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। छात्र संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को सिर्फ पत्र लिखने या बयानबाजी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर ठोस कदम उठाने होंगे। युवाओं के सब्र का बांध अब टूटने लगा है और वे रोजगार तथा पारदर्शी परीक्षा प्रणाली के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि सीईसी के इस्तीफे के विरोध से लेकर परीक्षा प्रणाली के सुधार तक, हर मुद्दे पर राजनीति हावी है। एक तरफ जहां सियासी दल अपनी रोटियां सेकने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश का युवा बेहतर भविष्य और न्याय की आस लगाए बैठा है। तस्वीरों में दिखने वाले चेहरे और नेताओं के भाषण भले ही कुछ और कहें, लेकिन सच यह है कि सत्ता की इस खींचतान में आम आदमी और छात्र पिस रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है क्योंकि चुनावी राज्यों में इन मुद्दों का असर सीधा वोटों की राजनीति पर पड़ेगा।







