चुनाव आयोग के भीतर सुलगती असहमति और आंतरिक आपत्तियों का सच
देश की सर्वोच्च चुनावी संस्था यानी भारत निर्वाचन आयोग इन दिनों एक बड़े वैचारिक और प्रशासनिक बवंडर के बीच घिर चुका है। एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान की खोजी रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों के दौरान आयोग के अंदरूनी फैसलों और कार्यप्रणाली को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने गंभीर आंतरिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। बताया जा रहा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर अभियान के दौर में कई महत्वपूर्ण फैसलों की जानकारी इन दोनों आयुक्तों को समय पर नहीं दी गई थी, जिससे अंदरखाने नाराजगी पनपी।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर निर्वाचन आयोग की तरफ से भी स्थिति स्पष्ट की गई है। आयोग का कहना है कि एक बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय होने के नाते वहां विभिन्न विषयों पर अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना एक बेहद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। आयोग ने यह भी जोर देकर कहा कि एसआईआर सहित पिछले एक साल के भीतर जितने भी अंतिम निर्णय लिए गए हैं, वे सभी सर्वसम्मति से ही तय किए गए हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दलों को इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी नजर आ रही है और उन्होंने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया है।
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विपक्षी दलों का आक्रामक रुख और इस्तीफे की मांग
मीडिया रिपोर्टों के सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग के शीर्ष नेतृत्व पर हमला बोल दिया है। कांग्रेस पार्टी के सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने के लिए संसद के शीतकालीन या आगामी सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना बना रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनावी प्रक्रियाओं के संचालन में नियमों की अनदेखी की गई है और पूरी संस्था की स्वायत्तता पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।
विपक्ष के इन तीखे तेवरों के बीच कुछ क्षेत्रीय दलों और संगठनों ने भी इस मामले में आक्रामक तेवर अपना लिए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे संगठनों ने तो खुलेआम चेतावनी दे दी है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त खुद आगे आकर अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो बड़े पैमाने पर देशव्यापी आंदोलन का आगाज किया जाएगा। इस राजनीतिक गहमागहमी के बाद आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहती है और क्या वाकई उन्हें इतनी आसानी से हटाया जा सकता है?
"संविधान ने चुनाव आयोग को जो स्वायत्तता दी है, वह हमारे लोकतंत्र की रीढ़ है। संस्था के भीतर मतभेद होना सामान्य हो सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।" — वरिष्ठ संवैधानिक विशेषज्ञ
संवैधानिक प्रावधान और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया
भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की पूरी जिम्मेदारी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग को सौंपी गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तें और उनके कार्यकाल को विनियमित करने के लिए संसद ने वर्ष 2023 में एक नया अधिनियम पारित किया था। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति देश के राष्ट्रपति द्वारा एक उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।
इस चयन समिति में देश के प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक अन्य कैबिनेट मंत्री शामिल होता है। वर्ष 2023 के इस नए अधिनियम के अनुसार, पद के लिए चुने जाने वाले व्यक्ति को भारत सरकार में सचिव स्तर के पद पर रह चुका होना चाहिए। साथ ही, उनका ट्रैक रिकॉर्ड पूरी तरह बेदाग और 'ईमानदार' होना चाहिए तथा उनके पास चुनावी प्रबंधन और संचालन का लंबा व व्यावहारिक अनुभव होना अनिवार्य माना गया है। इनका कार्यकाल छह साल या फिर 65 वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो भी पहले हो, निर्धारित किया गया है।
वेतन और शक्तियों को लेकर हुए हालिया बदलाव
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के वेतनमान को लेकर भी समय-समय पर नियम बदलते रहे हैं। साल 1991 के पुराने कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों का वेतन देश के सर्वोच्च न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के वेतन के बिल्कुल बराबर होता था। लेकिन नए 2023 के विधेयक में इन पदों के वेतन को केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव के वेतन के समतुल्य करने का प्रावधान कर दिया गया है। हालांकि वर्तमान समय में दोनों का वेतन लगभग एक समान ही है, लेकिन उनके निर्धारण की प्रक्रिया अलग है।
संविधान के अनुच्छेद 125 के प्रावधानों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के जज का वेतन संसद द्वारा बनाए गए विधिवत कानूनों के जरिए ही तय किया जा सकता है, जबकि कैबिनेट सचिव का वेतन सरकार केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर तय करती है। विश्लेषकों का मानना है कि इस नए बदलाव के कारण वेतन निर्धारण के मामले में कार्यपालिका को पूर्व की तुलना में कुछ अधिक प्रशासनिक अधिकार मिल सकते हैं, जो अक्सर चर्चा का विषय बनता है।
कितनी कठिन है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की महाभियोग प्रक्रिया
चुनाव आयोग जैसी महत्वपूर्ण स्वतंत्र संस्था पर किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या अनुचित प्रभाव को रोकने के लिए ही मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को बेहद जटिल और सुरक्षित बनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के स्पष्ट निर्देश के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी तरीके से और उन्हीं ठोस आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस प्रकार से सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश को पदमुक्त किया जाता है। इसके अलावा किसी अन्य चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124(4) में दर्ज है, जिसके तहत उन्हें केवल 'कदाचार साबित होने या फिर शारीरिक व मानसिक अक्षमता' के आधार पर ही हटाया जा सकता है। कदाचार के दायरे में किसी भी तरह का भ्रष्ट आचरण, पद का दुरुपयोग या ऐसा कोई भी कृत्य आता है जो संवैधानिक पद की गरिमा के अनुकूल न हो। अक्षमता का अर्थ ऐसी स्थिति से है जहां अधिकारी अपने दायित्वों का निर्वहन करने में सर्वथा असमर्थ साबित हो रहे हों।
संसद में कैसे चलता है महाभियोग का पूरा कानूनी सफर
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया की शुरुआत करने के लिए संसद के दोनों सदनों (लोकसभा या राज्यसभा) के सदस्यों को एक औपचारिक प्रस्ताव का नोटिस देना होता है। इस नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के ऊपर कदाचार या अक्षमता के आरोप स्पष्ट रूप से लिखित होने चाहिए। लोकसभा में इस प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, जबकि राज्यसभा के मामले में यह संख्या कम से कम 50 सांसदों की होती है।
संसद के पीठासीन अधिकारी इस प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज करने से पहले संबंधित दस्तावेजों की जांच करते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो आरोपों की सत्यता जांचने के लिए एक विशेष तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाता है। कमेटी की जांच में आरोप सही पाए जाने पर, महाभियोग के इस प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में 'उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों' के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना अनिवार्य होता है। दोनों सदनों में मुहर लगने के बाद राष्ट्रपति महोदय मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का अंतिम आदेश जारी करते हैं। भारतीय चुनावी इतिहास में आज तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग की नौबत नहीं आई है।





