बचपन की डायबिटीज पर चौंकाने वाला मेडिकल खुलासा
छोटे बच्चों में तेजी से फैल रही डायबिटीज की बीमारी को लेकर चिकित्सा जगत में एक बेहद अहम और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। अब तक ज्यादातर विशेषज्ञ यही मानते आए हैं कि बच्चों को होने वाली डायबिटीज मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों या पारिवारिक इतिहास की वजह से होती है। हालांकि, प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'नेचर मेटाबॉलिज़्म' में प्रकाशित ताजा शोध ने इस धारणा को काफी हद तक बदल दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे एक और बहुत बड़ा कारण आंतों के भीतर पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलित होना है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के आंकड़े बताते हैं कि देश में चौदह वर्ष से कम आयु के हजारों बच्चे इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं। नई रिसर्च के मुताबिक, जिन बच्चों के पेट में मौजूद सूक्ष्म जीवों यानी गट माइक्रोबायोम का विकास सही समय पर और सामान्य रूप से नहीं हो पाता, उनमें इस बीमारी की चपेट में आने की आशंका सामान्य बच्चों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक पाई गई है। यह खोज चिकित्सा विज्ञान के लिए बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर नए रास्ते खोलती है।
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आखिर क्या होता है गट माइक्रोबायोम और यह क्यों है जरूरी?
आम भाषा में कहें तो गट माइक्रोबायोम हमारी आंतों के अंदर रहने वाले अरबों बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्म जीवों का एक पूरा समुदाय होता है। यह सूक्ष्म जीव तंत्र हमारे शरीर के लिए कई जरूरी काम करता है, जिनमें जटिल कार्बोहाइड्रेट को पचाना और शरीर के लिए आवश्यक विटामिन्स का निर्माण करना शामिल है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि हमारे पूरे शरीर की इम्युनिटी का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा हमारे पेट और पाचन तंत्र से ही संचालित होता है।
जब एक बच्चा जन्म लेता है और बड़ा होता है, तो ये बैक्टीरिया उसके इम्यून सिस्टम को प्रशिक्षित करते हैं कि बाहरी संक्रमणों से कैसे निपटना है और शरीर के अपने अंगों की रक्षा किस प्रकार करनी है। लेकिन आधुनिक जीवनशैली, गलत खानपान और अन्य कारणों से जब आंतों के ये अच्छे बैक्टीरिया कम होने लगते हैं और हानिकारक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, तो शरीर की यह प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली गड़बड़ा जाती है, जिससे कई तरह की बीमारियां घेरने लगती हैं।
पेट की दीवार कमजोर होने से कैसे बिगड़ता है पूरा सिस्टम
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में यह स्पष्ट किया है कि जब आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या घटने लगती है, तो पेट की अंदरूनी दीवार कमजोर होने लगती है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस स्थिति को 'लीकी गट सिंड्रोम' कहा जाता है। इस स्थिति में कुछ हानिकारक टॉक्सिन्स और ठीक से न पचे हुए प्रोटीन्स आंतों से लीक होकर सीधे खून में मिलने लगते हैं।
खून में इन बाहरी तत्वों के पहुंचने पर शरीर का रक्षा तंत्र पूरी तरह भ्रमित हो जाता है। टॉक्सिन्स से लड़ने के प्रयास में प्रतिरक्षा तंत्र कई बार दुश्मन की सही पहचान नहीं कर पाता और गलती से शरीर की अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देता है। इसके परिणामस्वरूप पैंक्रियाज यानी अग्नाशय में इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को भारी नुकसान पहुंचता है और शरीर में इंसुलिन का उत्पादन कम या बिल्कुल बंद हो जाता है, जो इस गंभीर बीमारी की मुख्य वजह बनता है।
"बच्चों के पेट का स्वास्थ्य उनके पूरे शरीर के भविष्य की सेहत तय करता है। यदि हम शुरुआती दौर में ही उनकी खानपान की आदतों पर ध्यान दें और अनावश्यक दवाओं से बचाएं, तो कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।" — डॉ. आलोक शर्मा, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ
इन वजहों से तेजी से खराब हो रहा है बच्चों का गट हेल्थ
आज के समय में बच्चों की जीवनशैली में आए बदलाव उनके पेट के स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। बाजार में मिलने वाला अनहेडजियक जंक फूड, अत्यधिक प्रोसेस्ड चीजें और बात-बात पर बच्चों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक्स दवाएं आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को तेजी से खत्म कर रही हैं। बिना किसी डॉक्टर की सलाह के बार-बार एंटीबायोटिक देना बच्चों के पेट के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होता है।
इसके अलावा, बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी और ताजे घर के बने भोजन से दूरी भी इस समस्या को बढ़ा रही है। जब बच्चे फाइबरयुक्त चीजें, हरी सब्जियां और प्राकृतिक प्रोबायोटिक्स जैसे छाछ या दही का सेवन कम करते हैं, तो आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को पनपने का मौका नहीं मिलता।
बचाव के लिए क्या करें माता-पिता और कब सतर्क होना जरूरी
अपने बच्चों को इस तरह की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से सुरक्षित रखने के लिए माता-पिता को उनके खानपान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बच्चों की डाइट में मौसमी हरी सब्जियां, फल और घर का बना ताजा दही या छाछ जरूर शामिल करें। ये सभी चीजें आंतों में अच्छे बैक्टीरिया की संख्या बढ़ाने में मदद करती हैं। किसी भी छोटी-मोटी बीमारी में डॉक्टर की सलाह के बिना बच्चों को एंटीबायोटिक दवाएं बिल्कुल न दें।
इसके साथ ही, माता-पिता को कुछ शुरुआती लक्षणों पर हमेशा नजर रखनी चाहिए। यदि कोई बच्चा अचानक बहुत अधिक पानी पीने लगे, रात में बार-बार पेशाब जाने की शिकायत करे, भरपूर खाने के बावजूद उसका वजन तेजी से घटने लगे या वह हमेशा बहुत सुस्त और थका हुआ महसूस करे, तो इसे नजरअंदाज बिल्कुल न करें। तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से संपर्क कर बच्चे की जांच करवाएं ताकि समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें।






