महंगे फोन की स्क्रीन बचाने की चाहत में हो रहा बड़ा नुकसान
आज के दौर में हर किसी के हाथ में स्मार्टफोन है और हर यूजर अपनी डिवाइस कीमती होने की वजह से उसकी खास सुरक्षा चाहता है। फोन हाथ से फिसलकर गिर जाए और डिस्प्ले चटक जाए, तो जेब पर हजारों रुपये का भारी झटका लग सकता है। इस डर से बचने के लिए लोग तुरंत मोबाइल दुकानों का रुख करते हैं और अपनी स्क्रीन पर प्रोटेक्शन के लिए स्क्रीन गार्ड या टेम्पर्ड ग्लास लगवा लेते हैं। बाजार में पचास से सौ रुपये की मामूली कीमत में मिलने वाले ये ट्रांसपेरेंट ग्लास देखने में भले ही आकर्षक लगें और मन को सुरक्षा का झूठा अहसास कराएं, लेकिन हकीकत में ये आपकी जेब और फोन दोनों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं।
आम तौर पर लोग यह सोचते हैं कि कोई भी कांच का टुकड़ा स्क्रीन को बचा लेगा, लेकिन वे इस बात से अनजान होते हैं कि बिना किसी मानक और सर्टिफिकेशन के बिकने वाले ये सस्ते उत्पाद धीरे-धीरे फोन के अंदरूनी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अनुभव को नुकसान पहुंचा रहे हैं। फोन की मूल चमक, टच का रिस्पॉन्स और सुरक्षा फीचर्स इन घटिया सुरक्षा परतों की भेंट चढ़ जाते हैं। यह स्थिति न केवल तकनीकी रूप से कष्टदायक है, बल्कि लंबे समय में एक बड़े आर्थिक नुकसान का कारण भी बनती है क्योंकि सही समय पर समझदारी न दिखाने पर फोन की पूरी डिस्प्ले यूनिट बदलवानी पड़ सकती है।
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टच सेंसिटिविटी और फिंगरप्रिंट सेंसर पर सीधा असर
बाजार में मिलने वाले बेहद सस्ते स्क्रीन प्रोटेक्टरों की सबसे बड़ी समस्या उनकी खराब मोटाई और घटिया क्वालिटी का मटीरियल होती है। जब कोई मोटा और निम्न स्तर का ग्लास स्क्रीन पर चिपकाया जाता है, तो यूजर की उंगली और डिस्प्ले के टच सेंसर के बीच एक बारीक गैप या दूरी बन जाती है। इसकी वजह से टच रिस्पॉन्स धीमा हो जाता है और कई बार स्क्रीन पर स्वाइप करते समय कमांड ठीक से रजिस्टर नहीं होती। यूजर्स को अक्सर यह गलतफहमी हो जाती है कि उनके फोन का टचपैड खराब हो रहा है, जबकि असल गुनहगार वह सस्ता टेम्पर्ड ग्लास होता है जो उन्होंने कुछ पैसे बचाने के लिए अपनी स्क्रीन पर लगवाया था।
इसके अलावा, आधुनिक स्मार्टफोन में इन-डिस्प्ले फिंगरप्रिंट स्कैनर का चलन बहुत आम हो चुका है, जो स्क्रीन के ठीक नीचे फिट होता है। सस्ते और बिना जांचे-परखे ग्लास की बनावट इस ऑप्टिकल या अल्ट्रासोनिक सेंसर के रास्ते में रुकावट पैदा करती है। ग्लास की बनावट और पारदर्शिता सही न होने के कारण सेंसर यूजर की उंगली के निशान को स्कैन नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि फोन को अनलॉक करने के लिए कई-कई बार कोशिश करनी पड़ती है या फिर मजबूरन पिन और पैटर्न का इस्तेमाल करना पड़ता है, जो यूजर के दैनिक अनुभव को बेहद निराशाजनक बना देता है।
ओरिजिनल डिस्प्ले क्वालिटी और विजिबिलिटी में भारी गिरावट
स्मार्टफोन कंपनियां अपनी फोनों की स्क्रीन को शानदार और चमकदार बनाने के लिए भारी रिसर्च करती हैं, ताकि हाई-डेफिनिशन वीडियो देखते समय या तेज धूप में भी डिस्प्ले पूरी तरह साफ दिखाई दे। आधुनिक स्क्रीन्स पर खास एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग दी जाती है जो सूरज की तेज किरणों को परावर्तित करती है। लेकिन जब कोई ग्राहक बाजार से कोई भी लोकल और सस्ता स्क्रीन गार्ड लगवा लेता है, तो वह इन सभी आधुनिक तकनीकों को ढक देता है। खराब प्लास्टिक या घटिया ग्लास से बने होने के कारण ये प्रोटेक्टर स्क्रीन की चमक को फीका कर देते हैं और कलर्स की असली खूबसूरती छुप जाती है।
तेज धूप के समय ऐसे सस्ते ग्लास पर रोशनी पड़ने से एक अजीब सी चमक या चकाचौंध पैदा होती है, जिससे स्क्रीन पर लिखे शब्द या तस्वीरें पढ़ना लगभग असंभव हो जाता है। इसके साथ ही, कई बार मामूली सी टक्कर लगने पर जब यह सस्ता टेम्पर्ड ग्लास कोने से टूटता है, तो इसके बेहद महीन और नुकीले कांच के टुकड़े बिखर जाते हैं। ये अदृश्य कांच के कण यूजर की उंगलियों और हथेलियों में आसानी से चुभ सकते हैं, जिससे गंभीर चोट लगने का खतरा भी बना रहता है। इस तरह कुछ रुपयों की मामूली बचत करने की जिद कई मोर्चों पर भारी पड़ जाती है।
सरकार का कड़ा कदम: अब गुणवत्ता मानकों के दायरे में आएंगे स्क्रीन गार्ड
मोबाइल उपयोगकर्ताओं की इन तमाम परेशानियों और बाजार में बिक रहे घटिया उत्पादों के साम्राज्य को देखते हुए अब सरकार ने बड़ा और कड़ा रुख अपनाया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने स्मार्टफोन स्क्रीन प्रोटेक्टरों को भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस (BIS) के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के दायरे में लाने का बड़ा फैसला किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में बाजार में वही स्क्रीन गार्ड बिक सकेंगे जो तय क्वालिटी स्टैंडर्ड और सुरक्षा पैमानों पर पूरी तरह खरे उतरेंगे। बिना मानक वाले उत्पादों की खुलेआम बिक्री पर कानूनी शिकंजा कसा जाएगा।
"आम नागरिकों की सुविधा और तकनीक की सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। गुणवत्ता से समझौता करने वाले उत्पादों पर लगाम कसने के लिए यह नियम मील का पत्थर साबित होगा।" — तकनीकी मामलों के विशेषज्ञ
यह नया नियम निर्धारित समयसीमा के तहत लागू होने की प्रक्रिया में है, जिसके बाद से सड़क किनारे या लोकल दुकानों पर मिलने वाले 30 से 50 रुपये के बेकार क्वालिटी वाले स्क्रीन गार्ड का दौर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। सरकार के इस कदम से उपभोक्ताओं को न केवल बेहतर क्वालिटी के प्रमाणित उत्पाद मिलेंगे, बल्कि उनकी डिवाइस भी सुरक्षित रहेगी। मानक तय होने से निर्माताओं को भी अच्छी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिससे अंततः ग्राहकों का ही फायदा होगा।
सुरक्षित तकनीक अपनाएं और समझदारी से करें खरीदारी
तकनीकी जानकारों और विशेषज्ञों का साफ तौर पर यही कहना है कि अपने महंगे स्मार्टफोन की सुरक्षा के मामले में कभी भी कंजूसी नहीं करनी चाहिए। जब आप सत्तर-अस्सी हजार या पंद्रह-बीस हजार रुपये खर्च करके एक बेहतरीन फोन खरीदते हैं, तो उसकी सुरक्षा पर थोड़ा सा निवेश करना समझदारी का काम है। हमेशा अच्छी ब्रांडेड कंपनियों के स्क्रीन प्रोटेक्टर ही चुनें जिन पर स्पष्ट रूप से क्वालिटी सर्टिफिकेशन या वारंटी का जिक्र हो। केवल चंद रुपयों की बचत के चक्कर में लोकल और घटिया टेम्पर्ड ग्लास लगवाना आपके फोन की महंगे डिस्प्ले पैनल को हमेशा के लिए खतरे में डाल सकता है।
खरीदारी करते वक्त हमेशा यह जांच लें कि स्क्रीन गार्ड की मोटाई कम हो, उसकी पारदर्शिता उच्च कोटि की हो और वह फिंगरप्रिंट सेंसर तथा टच सेंसिटिविटी में किसी तरह की बाधा न डाले। जागरूक नागरिक बनकर ही हम ऐसी धोखाधड़ी और खराब गुणवत्ता वाले सामानों से बाजार को मुक्त करा सकते हैं। अपनी आंखों की रोशनी, उंगलियों की सुरक्षा और फोन के डिस्प्ले की लंबी उम्र बनाए रखने के लिए हमेशा सर्टिफाइड और भरोसेमंद एक्सेसरीज का ही चुनाव करें, ताकि आपकी जेब पर कभी भी अचानक भारी आर्थिक बोझ न पड़े।






