उत्तराखंड में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान संपन्न
भारत निर्वाचन आयोग के सख्त निर्देशों के बाद उत्तराखंड में मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive Revision) अभियान के नतीजे अब पूरी तरह सामने आ चुके हैं। इस बड़े प्रशासनिक अभ्यास के बाद राज्य के विभिन्न जिलों में मतदाता आंकड़ों में जबरदस्त फेरबदल देखने को मिला है। राजधानी देहरादून की बात करें तो यहां मतदाताओं की संख्या में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है, जिसने राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों को नए सिरे से अपनी रणनीति बनाने पर मजबूर कर दिया है।
प्रदेशभर में इस अभियान की शुरुआत जून के महीने में हुई थी, जिसके तहत घर-घर जाकर गणना फॉर्म बांटे गए और उनका संकलन किया गया। इसके बाद जुलाई के मध्य में ड्राफ्ट मतदाता सूची सार्वजनिक की गई थी। तमाम आपत्तियों और दावों के निपटारे के बाद निर्वाचन विभाग ने अब अंतिम और अधिकृत मतदाता सूची जारी कर दी है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर पर्वतीय राज्य के प्रमुख शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों के चुनावी समीकरणों पर पड़ता हुआ साफ दिखाई दे रहा है।
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देहरादून जिले में लगभग तीन लाख मतदाताओं की संख्या घटी
उत्तराखंड के सबसे अहम और राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों में गिने जाने वाले देहरादून में एसआईआर अभियान का सबसे व्यापक प्रभाव देखने को मिला है। पूर्व के विधानसभा चुनावों और मौजूदा प्रारूप सूची के आंकड़ों की तुलना करें तो जिले के कुल मतदाताओं की संख्या में लगभग 2 लाख 97 हजार की भारी कमी आई है। इस अप्रत्याशित गिरावट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं का कम होना किसी भी दल के पारंपरिक वोट बैंक को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान देहरादून जिले की सभी दस विधानसभा सीटों को मिलाकर कुल 14 लाख 87 हजार से अधिक मतदाता पंजीकृत थे। हालांकि, नवीनतम पुनरीक्षण के बाद अब यह आंकड़ा घटकर करीब 11 लाख 90 हजार के आसपास पहुंच गया है। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो कुल मतदाताओं में लगभग बीस प्रतिशत का यह अंतर काफी बड़ा माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि मृत मतदाताओं के नाम हटने, पते बदलने और डुप्लीकेट प्रविष्टियों के हटने के कारण यह भारी फेरबदल सामने आया है।
धर्मपुर और कैंट सीटों पर सबसे बड़ा चुनावी उलटफेर
देहरादून जिले के भीतर भी विधानसभावार स्थिति का विश्लेषण करें तो कुछ सीटों पर मतदाताओं की संख्या में सबसे भारी गिरावट दर्ज की गई है। धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में सबसे बड़ा अंतर सामने आया है, जहां पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग साठ हजार मतदाता कम दर्ज किए गए हैं। इसी तरह देहरादून कैंट, ऋषिकेश और रायपुर विधानसभा क्षेत्रों में भी चालीस हजार से अधिक मतदाताओं का अंतर देखने को मिला है। राजपुर रोड और मसूरी सीटों पर भी मतदाताओं की संख्या में खासी कमी आई है।
इसके उलट, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों जैसे विकासनगर और चकराता में मतदाताओं की संख्या में अपेक्षाकृत बहुत कम अंतर देखने को मिला है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरी इलाकों में किराए पर रहने वाले लोगों के बार-बार ठिकाने बदलने और सत्यापन प्रक्रिया के दौरान सही विवरण न मिलने के कारण शहरी सीटों पर नाम कटने की यह दर सबसे अधिक रही है। इन बदलावों के बाद भाजपा और कांग्रेस समेत तमाम दलों को अपने बूथ स्तर के प्रबंधन को पूरी तरह से नए सिरे से जांचना पड़ रहा है.
"मतदाता सूची का यह गहन पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक अहम कदम है, जिससे फर्जी और दोहरे नाम स्वतः बाहर हो जाते हैं और सही नागरिकों को मताधिकार का स्पष्ट लाभ मिलता है।" — निर्वाचन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी
राज्यभर में कुल मतदाताओं का आंकड़ा और नए नाम जुड़ने की प्रक्रिया
केवल देहरादून ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड राज्य की बात करें तो एसआईआर अभियान के समापन के बाद कुल मतदाताओं की संख्या 71 लाख 58 हजार से अधिक हो गई है। जब यह अभियान शुरू हुआ था, तब राज्य में कुल मतदाताओं का दायरा लगभग 79 लाख के आसपास था। अभियान के दौरान विभिन्न चरणों में जांच-पड़ताल और दावों के निस्तारण के बाद जहां एक तरफ लाखों अपात्र या डुप्लीकेट नाम हटाए गए, वहीं दूसरी तरफ नए पात्र युवाओं के नाम भी सूची में जोड़े गए हैं।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, अंतिम प्रकाशन से पहले लगभग 1 लाख 30 हजार नए मतदाताओं को सूची में जगह दी गई है, जिन्होंने अपनी निर्धारित अर्हता पूरी कर ली थी। वहीं दूसरी ओर, विभिन्न कारणों से अयोग्य पाए गए लगभग एक लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इनमें फॉर्म 7 के अंतर्गत प्राप्त आपत्तियों और नियमों के विपरीत पाए गए मामलों पर कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की गई है, जिससे वोटर लिस्ट पूरी तरह त्रुटिरहित हो सके।
राजनीतिक दलों के सामने बूथवार समीकरणों की नई चुनौती
मतदाता सूची के इस बड़े बदलाव ने आगामी चुनावों की तैयारियों में जुटे राजनीतिक दलों के सामने एक नई और बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। जिन बूथों पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम कटे हैं, वहां पिछले चुनावों के जीत-हार के अंतर और वोट शेयर के समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। राजनीतिक दलों के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को अब नए सिरे से घर-घर संपर्क अभियान चलाना होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके समर्थक मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से बाहर न हों।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड में हुआ यह विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान प्रशासनिक रूप से भले ही सूचियों को शुद्ध करने का एक प्रयास हो, लेकिन इसका दीर्घकालिक असर राज्य की चुनावी राजनीति और हर एक सीट के जीत के अंतर पर गहरा प्रभाव डालने वाला है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इन बदले हुए आंकड़ों के बीच अपनी चुनावी रणनीति को किस तरह ढालते हैं।




