दिल्ली की मतदाता सूची में भारी फेरबदल पर गर्माई सियासत
देश की राजधानी दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों मतदाता सूचियों से नाम गायब होने का मुद्दा सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में कराई गई मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद आंकड़ों में आए भारी अंतर ने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है। विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन ने इस पूरे घटनाक्रम पर गहरी आपत्ति जताई है और इसे लोकतंत्र की बुनियाद पर सीधा हमला करार दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दिल्ली के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में करीब 47 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की बात सामने आ रही है। इतनी बड़ी संख्या में नाम कटने के बाद से ही राजनीतिक दलों के भीतर हलचल मची हुई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं हो सकता, बल्कि इसके पीछे कोई सोची-समझी प्रशासनिक या राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
INDIA ब्लॉक का जमीनी हमला, 23 अक्टूबर से शुरू होगा विशेष अभियान
इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए विपक्षी दलों के संयुक्त मंच 'INDIA' ने अब सड़क से लेकर संसद तक आर-पार की लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है। गठबंधन की ओर से घोषणा की गई है कि आगामी 23 अक्टूबर से दिल्ली के हर कोने, गली और मोहल्ले में एक विशेष अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य उन मतदाताओं की सुध लेना है जिनके नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं या जिनके नाम में तकनीकी गड़बड़ियां पाई गई हैं।
अभियान के तहत विपक्षी कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों की मतदाता पर्चियों की जांच करेंगे। जिन नागरिकों के नाम सूची से गायब मिले हैं, उनके फॉर्म भरवाने और उन्हें दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया में मदद की जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों से ठीक पहले यह मुद्दा दिल्ली की सियासत का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है, क्योंकि शहरी मतदाताओं की नाराजगी किसी भी सरकार के लिए भारी पड़ सकती है।
वोटर लिस्ट से नाम कटने पर विपक्षी नेताओं के तीखे तेवर
विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार और चुनाव अधिकारियों पर तीखे हमले किए हैं। नेताओं का साफ कहना है कि किसी भी नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित करना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। बिना उचित पूर्व सूचना या ठोस कारणों के इतनी बड़ी तादाद में नाम डिलीट किए जाने पर कई तरह के गंभीर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।
"लोकतंत्र में हर एक वोट कीमती होता है और जनता का अधिकार उसकी ताकत है। बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब कर देना सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। हम इस अन्याय के खिलाफ चुप नहीं बैठेंगे।" — प्रमुख विपक्षी नेता, INDIA ब्लॉक
नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरी प्रक्रिया में झुग्गी-झोपड़ियों और अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों को खासतौर पर निशाना बनाया गया है। इन इलाकों में रहने वाले लोग अक्सर रोजगार के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं, जिसका फायदा उठाकर उनके नाम सूची से हटाए जाने की शिकायतें मिल रही हैं।
प्रशासनिक सफाई और चुनाव आयोग की भूमिका पर निगाहें
दूसरी ओर, चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक तंत्र ने इन तमाम आरोपों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। अधिकारियों का दावा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण पूरी तरह से पारदर्शी और नियमानुसार किया गया है। जो नाम हटाए गए हैं, वे या तो मृत व्यक्तियों के थे, या फिर वे लोग जो उस पते पर अब स्थाई रूप से निवास नहीं करते हैं या जिनके नाम दो अलग-अलग जगहों पर दर्ज थे।
हालांकि, प्रशासनिक तर्कों के बावजूद जनता के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जो सालों से एक ही पते पर रह रहे हैं, लेकिन उनका नाम भी अचानक सूची से गायब मिला है। ऐसे मामलों ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है, जिससे जनता में रोष व्याप्त है।
आगामी चुनावों पर क्या पड़ेगा इस सियासी घमासान का असर
दिल्ली में होने वाले आगामी राजनीतिक चुनावों के मद्देनजर यह मुद्दा अब एक बड़ा चुनावी हथियार बनता जा रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज होता जा रहा है। एक तरफ जहां सरकार अपनी योजनाओं के जरिए जनता को साधने में लगी है, वहीं विपक्ष इस प्रकार के जमीनी मुद्दों को उठाकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना यह होगा कि 23 अक्टूबर से शुरू होने वाले इस बड़े जमीनी अभियान का धरातल पर कितना असर देखने को मिलता है। क्या चुनाव आयोग इन शिकायतों का समय रहते समाधान कर पाएगा या फिर यह विवाद दिल्ली की सियासत में एक लंबी लकीर खींच देगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल, आम जनता के अधिकार और चुनावी पारदर्शिता को लेकर बहस अपने चरम पर है।












