दिल्ली की नई ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट पर उठे गंभीर सवाल
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में जारी की गई दिल्ली की नई ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट ने राजनीतिक गलियारों और चुनावी विश्लेषकों के बीच हलचल पैदा कर दी है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी की कई विधानसभा सीटों पर ऐसा अजीबोगरीब परिदृश्य सामने आया है, जहां वर्तमान ड्राफ़्ट सूची में दर्ज कुल मतदाताओं की संख्या पिछले साल हुए चुनावों में実際に वोट डालने वाले नागरिकों की संख्या से भी कम हो गई है। यह स्थिति चुनावी लोकतंत्र की पारदर्शिता और मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) प्रक्रिया के तहत तैयार की गई इस नई सूची में कुल 97,53,577 मतदाताओं के नाम दर्ज हैं। यदि इसकी तुलना फरवरी 2025 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों से की जाए, तो उस दौरान कुल 94,94,607 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस प्रकार, अठारह महीने बाद आई इस नई योग्य मतदाताओं की सूची में पिछले साल वोट देने वाले लोगों की संख्या से केवल 2,58,970 यानी मात्र 2.7 प्रतिशत अधिक नाम ही जुड़ पाए हैं।
यह मामूली बढ़त अपने आप में कई अनछुए पहलुओं की ओर इशारा करती है। जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी आबादी वाले महानगर में मात्र पौने तीन लाख नए मतदाताओं का जुड़ना और कई निर्वाचन क्षेत्रों में आंकड़ों का गिर जाना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से परे किसी बड़े फेरबदल की ओर इशारा करता है। राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र संगठन अब इस बात की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में नाम सूची से कैसे गायब हो गए।
संबंधित खबरें
24 विधानसभा सीटों पर हैरान करने वाले आंकड़े
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में से 24 सीटें ऐसी हैं, जहां यह अंतर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। इन विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों में ड्राफ़्ट सूची के मतदाताओं की संख्या फरवरी 2025 के मतदान रिकॉर्ड से भी नीचे लुढ़क गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि आज की तारीख में उन क्षेत्रों में जितने लोगों के नाम वोटर लिस्ट में हैं, उससे कहीं अधिक लोग पिछले चुनाव में ईवीएम का बटन दबाकर आ चुके थे।
मैंडेट एनालिटिक्स द्वारा चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से जुटाए गए और विश्लेषित किए गए विधानसभा क्षेत्र-वार आंकड़ों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के तहत 31 अगस्त को जारी की गई सूची में इन 24 सीटों पर मतदाताओं का ग्राफ नीचे की तरफ गया है। ऐसे में यह सवाल आम जनता और राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन गया है कि क्या वे सारे लोग जो पहले वोट दे चुके थे, अचानक से मतदाता सूची से बाहर कैसे हो गए।
इस प्रकार के असंतुलन से यह बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या इस गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में उन वैध और असली मतदाताओं के नाम भी काट दिए गए, जिन्होंने कुछ समय पहले ही अपना वोट डाला था। या फिर इसका दूसरा पहलू यह है कि क्या पिछले साल के चुनाव में इस्तेमाल की गई मतदाता सूचियों में भारी मात्रा में फर्जी, मृत या दोहरे नाम मौजूद थे, जिन्हें अब जाकर साफ किया गया है। चुनाव आयोग की ओर से अभी तक इस विशेष अंतर पर कोई विस्तृत और स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे जनता और राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ती जा रही है।
बूथ लेवल अधिकारियों के सर्वे और 'अनकलेक्टेबल' फॉर्म
इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत 1.45 करोड़ नामों की एक बेस लिस्ट के साथ हुई थी। यह शुरुआती आंकड़ा भी 2025 के विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल होने वाली वोटर लिस्ट से लगभग 11.16 लाख कम था। नियम के अनुसार, इस बेस लिस्ट में शामिल प्रत्येक मतदाता को बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के माध्यम से एक विशेष एन्यूमरेशन फॉर्म प्राप्त होना था और उस भरे हुए फॉर्म को वापस जमा कराना अनिवार्य था।
हालांकि, मैदानी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जिन मतदाताओं के फॉर्म वापस नहीं मिल पाए, उन्हें प्रशासनिक शब्दावली में 'अनकलेक्टेबल' यानी असग्रणीय घोषित कर दिया गया। इन फॉर्मों को आगे कई श्रेणियों में बांटा गया, जैसे कि एब्सेंट यानी मौके पर मौजूद न होना, शिफ्टेड यानी अन्य स्थान पर चले जाना, डेड यानी मृत घोषित करना, या फिर डुप्लिकेट और अन्य कारणों से नाम हटाना। इन सभी श्रेणियों के आधार पर अंततः उन मतदाताओं के नाम ड्राफ़्ट रोल से पूरी तरह हटा दिए गए।
आंकड़ों पर गौर करें तो पूरी दिल्ली में लगभग 47,56,722 फॉर्म ऐसे थे जिन्हें अनकलेक्टेबल मार्क किया गया। यह हैरान करने वाला आंकड़ा पूरी बेस लिस्ट का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बनता है। इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के सत्यापन न हो पाने की स्थिति ने प्रशासनिक व्यवस्था और घर-घर जाकर सर्वे करने वाले तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्षेत्रवार असमानता और प्रशासनिक चुनौतियां
मतदाताओं के नाम हटाने की यह प्रक्रिया दिल्ली के सभी हिस्सों में एक समान रूप से नहीं चली। भौगोलिक और सामाजिक आधार पर इसमें भारी क्षेत्रीय असमानता देखने को मिली है। उदाहरण के लिए, साउथ ईस्ट दिल्ली के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में स्थिति बिल्कुल अलग थी, जहां बेस लिस्ट के औसतन 43.5 प्रतिशत नामों को 'अनकलेक्टेबल' घोषित कर दिया गया। इसके विपरीत, आउटर नॉर्थ दिल्ली में यह प्रतिशत काफी कम यानी करीब 24.3 प्रतिशत दर्ज किया गया।
इतने बड़े अंतर और क्षेत्रीय असमानता ने कई प्रशासनिक और सामाजिक विसंगतियों को जन्म दिया है। जानकारों का कहना है कि प्रवासी आबादी वाले क्षेत्रों, किराए के मकानों में रहने वाले कामकाजी लोगों और झुग्गी-झोपड़ी क्लस्टर वाले इलाकों में लोगों के फॉर्म समय पर जमा न हो पाना एक आम समस्या रही है। लेकिन इस तकनीकी या प्रशासनिक विफलता की वजह से किसी नागरिक के मताधिकार का छिन जाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता है।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषकों का यह भी दावा है कि जून 2025 से बिहार से शुरू हुई इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ़्ट वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं। अकेले दिल्ली की बात करें तो 2025 की तुलना में मौजूदा ड्राफ़्ट सूची में करीब 58.73 लाख यानी लगभग 37.6 प्रतिशत नाम कम हो चुके हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा बदलाव है।
चुनाव आयोग से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग
बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से गायब होने के बाद अब राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण की मांग तेज कर दी है। आलोचकों का तर्क है कि लोकतंत्र का आधार हर एक योग्य नागरिक का वोट डालने का अधिकार है। यदि प्रक्रिया के नाम पर वैध मतदाताओं के नाम इस तरह से हटाए जाएंगे, तो चुनावी प्रक्रिया पर से जनता का भरोसा डगमगा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग को आगे आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिन 24 सीटों पर मतदान करने वालों से भी कम वोटर बचे हैं, वहां वास्तविकता क्या है। क्या मृत और फर्जी मतदाताओं की संख्या वाकई इतनी अधिक थी, या फिर फील्ड सर्वे के दौरान प्रशासनिक लापरवाही के कारण वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से कट गए हैं। जनता के इन तमाम वाजिब सवालों के बीच चुनाव आयोग की अगली प्रतिक्रिया और सुधारात्मक कदम इस बात का फैसला करेंगे कि आने वाले चुनावों में मतदाता सूची कितनी भरोसेमंद साबित होती है।
"दिल्ली की वोटर लिस्ट में हुए इस भारी फेरबदल और 24 सीटों पर मतदान से भी कम मतदाताओं के आंकड़े ने पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव आयोग को इस अंतर का सार्वजनिक और पारदर्शी जवाब देना चाहिए ताकि नागरिकों का लोकतंत्र पर से विश्वास न उठे।" — चुनावी विश्लेषक और डेटा शोधकर्ता








