दिल्ली में विपक्षी दलों की महाबैठक और बड़ा रणनीतिक मंथन
देश की राजधानी नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक आखिरकार संपन्न हो गई। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित वोट चोरी और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियों के आरोपों को लेकर तीखा मंथन किया गया। करीब साढ़े तीन घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में देश के तमाम बड़े राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता एक मंच पर जुटे और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का फैसला किया।
इस बैठक में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, शीर्ष नेता राहुल गांधी, कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी के साथ-साथ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, एनसीपी (एसएपी) नेता सुप्रिया सुले, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला समेत कई प्रमुख चेहरे व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए। इसके अलावा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस वर्चुअल चर्चा से जुड़े और अपनी बात रखी।
हालांकि, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग को लेकर चल रही राजनीतिक खींचतान के चलते बैठक में खुद शामिल नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने अपनी तरफ से दो वरिष्ठ सांसदों को इस अहम चर्चा में हिस्सा लेने के लिए भेजा। वहीं, आम आदमी पार्टी और डीएमके के नेताओं ने भी इस बैठक से दूरी बनाए रखी, जिस पर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसके बावजूद विपक्षी कुनबे ने अपनी एकजुटता का संदेश देते हुए आने वाले दिनों में सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ कड़े संघर्ष का ऐलान कर दिया है।
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महाभियोग प्रस्ताव से पीछे हटा विपक्ष, अब छेड़ेगा जमीनी राजनीतिक लड़ाई
शुरुआती दौर में संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की सुगबुगाहट तेज थी। विपक्षी सांसदों द्वारा इस दिशा में नोटिस देने की भी पूरी तैयारी कर ली गई थी। हालांकि, संसद के मौजूदा गणित और दोनों सदनों में बहुमत के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए विपक्षी दलों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव कर लिया है। अब संसद के भीतर औपचारिकता पूरी करने की बजाय विपक्षी दलों ने सीधे तौर पर जनता के बीच जाकर जमीनी आंदोलन छेड़ने का पक्का इरादा कर लिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महाभियोग प्रस्ताव के खारिज होने की संभावनाओं को भांपते हुए विपक्ष ने जनता की अदालत में अपनी बात रखने का फैसला किया है। इसके तहत आगामी 1 नवंबर से देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से इंडिया गठबंधन अपनी पहली विशाल देशव्यापी रैली का आगाज करेगा। दिल्ली के बाद इस प्रकार के विरोध प्रदर्शनों और रैलियों का सिलसिला देश के अन्य प्रमुख महानगरों जैसे मुंबई और कोलकाता में भी बेहद आक्रामक तरीके से चलाया जाएगा, ताकि आम जनता तक चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठाए जा रहे सवालों को पहुंचाया जा सके।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए पूरे आंदोलन की रूपरेखा और तारीखों का खाका पेश किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए विपक्ष अब चुप बैठने वाला नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि निष्पक्ष चुनावों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है, जिसका डटकर मुकाबला किया जाएगा।
ममता बनर्जी का तीखा हमला, कहा—सीईसी ज्ञानेश कुमार तुरंत दें इस्तीफा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कॉन्स्टीट्यूशन क्लब की बैठक के बाद मीडिया के सामने बेहद आक्रामक तेवर दिखाए। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि अब दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में सॉफ्टवेयर बदलकर वोटों की बड़ी चोरी को अंजाम दिया गया है, जिसके पुख्ता सबूत सामने आ रहे हैं।
ममता बनर्जी ने दो टूक शब्दों में मांग की कि मुख्य चुनाव आयुक्त को एक मिनट भी अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक या संवैधानिक अधिकार नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि CEC ज्ञानेश कुमार को तुरंत प्रभाव से अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। ममता ने देश के युवाओं, छात्रों, आम नागरिकों, गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं और मीडिया से भी इस लड़ाई में आगे आने की जोरदार अपील की।
"अब तो पूरी दुनिया के सामने यह बात आ चुकी है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार ने चुनावों में धांधली की है। उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हमारा यह आंदोलन और भी अधिक तेज होगा और हम हर स्तर पर इसका विरोध करेंगे।" — ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने यह भी सुझाव दिया कि इंडिया गठबंधन का दायरा और अधिक बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से असहमत अन्य क्षेत्रीय दलों, जैसे बीजू जनता दल (BJD) जैसी पार्टियों से भी संवाद स्थापित किया जाना चाहिए ताकि तानाशाही ताकतों के खिलाफ देशव्यापी प्रतिरोध को और अधिक मजबूत किया जा सके।
राहुल गांधी और अन्य नेताओं के तीखे तेवर, चुनाव आयोग की आईटी विंग पर भी उठे सवाल
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ-साथ देश की शीर्ष राजनीतिक लीडरशिप पर जमकर हमला बोला। राहुल गांधी ने तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि आखिर क्या वजह है कि सीईसी ज्ञानेश कुमार को इतनी भारी 'लाइफटाइम कानूनी छूट' और सुरक्षा कवच प्रदान किया गया है? उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग देश के संविधान और लोकतंत्र पर सीधा प्रहार कर रहे हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा और विपक्ष उनके खिलाफ कानूनी व राजनीतिक दोनों मोर्चों पर अंतिम दम तक लड़ेगा।
बैठक में कानूनी जानकारों और वरिष्ठ वकीलों की सलाह पर यह भी तय किया गया कि चुनाव आयुक्तों को कानूनी इम्युनिटी देने वाले साल 2023 के उस विवादास्पद कानून के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा। जाने-माने वकील और सांसद कपिल सिब्बल ने इस संबंध में एक पुख्ता कानूनी याचिका दाखिल करने का सुझाव दिया, जिस पर गठबंधन के सभी घटक दलों ने एकमत होकर अपनी सहमति जताई है।
इसके साथ ही, चुनाव आयोग की आईटी डिविजन की महानिदेशक सीमा खन्ना की भूमिका को लेकर भी विपक्ष ने गहरी आपत्ति जताई है। एसआईआर प्रक्रिया और कथित वोट चोरी के मामलों में चुनाव आयोग के तकनीकी तंत्र को घेरने के लिए आईटी विंग के अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी भी की जा रही है। एनसीपी नेता जितेंद्र आव्हाड ने महाराष्ट्र के चुनावी आंकड़ों का हवाला देते हुए वोटिंग प्रतिशत में रहस्यमय बढ़ोतरी पर गंभीर सवाल उठाए और बैलेट पेपर व्यवस्था को दोबारा बहाल करने की पुरजोर मांग की है।
निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक राह
बहरहाल, इंडिया गठबंधन की इस उच्चस्तरीय बैठक ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष का तेवर बेहद आक्रामक रहने वाला है। संसद के पटल से लेकर सड़क तक सियासी घमासान तेज होने के पूरे आसार हैं। विपक्षी दल जहां एक तरफ कानूनी दांवपेंच के जरिए चुनाव आयोग के अधिकारियों को घेरने की योजना बना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों में रैलियां आयोजित कर जनता का समर्थन जुटाने की कवायद शुरू कर दी गई है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि विपक्ष का यह नया जमीनी आंदोलन राजनीतिक रूप से कितना असरदार साबित होता है।




